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49 साल पहले 300 रुपये की रिश्वत... अब जाकर मिला हिसाब!
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 41 साल से लंबित एक आपराधिक अपील को खारिज करते हुए कंसोलिडेशन लेखपाल महेश चंद की सजा बरकरार रखी है। अब उन्हें 4 सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर कर अपनी बाकी सजा पूरी करनी होगी।
यह मामला 1977 का है। आरोप था कि जमीन विवाद में मदद करने के बदले लेखपाल ने 400 रुपये की रिश्वत मांगी थी। शिकायत मिलने पर विजिलेंस ने जाल बिछाया और उसे 300 रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया। जांच में नोट, रासायनिक परीक्षण और गवाहों के बयानों ने रिश्वत लेने की पुष्टि की।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि यदि ट्रैप कार्रवाई, विजिलेंस अधिकारियों और स्वतंत्र गवाहों के बयान भरोसेमंद हैं, तो केवल शिकायतकर्ता के अदालत में गवाही न देने से पूरा मामला कमजोर नहीं हो जाता।
आरोपी ने यह तर्क भी दिया कि कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक जगह पर रिश्वत नहीं लेगा, लेकिन कोर्ट ने इसे भी खारिज कर दिया और कहा कि ऐसे ट्रैप पूरी गोपनीयता से किए जाते हैं।
⚖️ 49 साल पुराने रिश्वत कां*ड में आखिरकार कानून ने अपना काम पूरा किया... यह फैसला साफ संदेश देता है कि भ्र*ष्टाचार के मामलों में न्याय भले देर से मिले, लेकिन कानून का शिकंजा आखिरकार कसता जरूर है।

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