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तुलसीदास जी भगवान श्रीजगन्नाथ के दर्शन की अभिलाषा लेकर पुरी पहुँचे, किंतु गर्भगृह में हस्तपादविहीन दारुमूर्ति (हाथ-पैर रहित काष्ठ की मूर्ति) देखकर वे ठिठक गए। उनके मन में टीस उठी कि सौंदर्य की पराकाष्ठा उनके ईष्ट श्रीराम ऐसे कैसे हो सकते हैं? दुखी मन से वे मंदिर के बाहर एक वृक्ष के नीचे बैठ गए और भूखे-प्यासे रात बिताने लगे।
तभी प्रभु स्वयं एक बालक के रूप में उनके पास आए और जगन्नाथ जी का प्रसाद (भात) लेकर आए। तुलसीदास जी ने यह कहकर प्रसाद लेने से मना कर दिया कि वे अपने ईष्ट को भोग लगाए बिना कुछ ग्रहण नहीं करते और जगन्नाथ का यह रूप उन्हें स्वीकार नहीं।
तब उस दिव्य बालक ने उन्हें उन्हीं की 'रामचरितमानस' की चौपाई याद दिलाई— "बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु कर्म करइ बिधि नाना। आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥" और बताया कि वे निर्गुण ब्रह्म ही यहाँ सगुण रूप में विराजमान हैं। सत्य का बोध होते ही तुलसीदास जी की आँखों से अश्रु बहने लगे। अगली सुबह जब वे पुनः मंदिर गए, तो उन्हें भगवान जगन्नाथ के स्थान पर साक्षात् श्रीराम, लक्ष्मण और जानकी के दर्शन हुए। भगवान ने भक्त की अटूट श्रद्धा के लिए अपना रूप बदल लिया।

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