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11 साल की उम्र में जिंदगी ने उनसे माता-पिता का साया छीन लिया। लेकिन उसी दर्द को अमन सहरावत ने अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में कोच महाबली सतपाल के मार्गदर्शन में उन्होंने एक ऐसा सपना देखा, जिसे हर दिन जीना शुरू कर दिया। कमरे की दीवार पर उन्होंने लिख रखा था "अगर गोल्ड जीतना आसान होता, तो हर कोई जीत जाता।" सामने तिरंगा, ओलंपिक गोल्ड मेडल की तस्वीर और ओलंपिक रिंग्स... यही उनके हर दिन की प्रेरणा थे।
सालों की कड़ी मेहनत रंग लाई। 2024 में अमन ने ओलंपिक ब्रॉन्ज जीतकर भारत के सबसे युवा ओलंपिक पदक विजेता पहलवान बनने का इतिहास रचा। और अब उन्होंने बुडापेस्ट में आयोजित पोल्याक इमरे, वर्गा जानोस और कोज़मा इस्तवान मेमोरियल 2026 में पुरुषों के 57 किग्रा फ्रीस्टाइल वर्ग का गोल्ड मेडल जीतकर एक बार फिर भारत का तिरंगा दुनिया के सामने गर्व से लहरा दिया।
अमन सहरावत की कहानी बताती है कि हालात चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों तो वही दर्द एक दिन आपकी सबसे बड़ी पहचान बन सकता है। पूरे देश को आप पर गर्व है, अमन। बहुत-बहुत बधाई!
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