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जब स्कूल में थे तो अपने किसी इवेंट में जज लोगों को बहुत कौतूहल से देखते थे, उनके सामने भाषण या डिबेट देते समय यह सोचती थी कि ऐसा क्या कह दूँ कि पुरस्कार मुझे ही मिले!

टेबल अब टर्न हो गई है...यह है लेखक होने का हासिल।
आज उस कुर्सी पर मैं स्वयं हूँ और मेरे सामने बहुत प्यारे बच्चे! यह बच्ची कबीर दास बनकर उनका दोहा सुना रही हैं...!

देखते हैं क्या होता है निर्णय...? और बच्चे रहीम -तुलसीदास जी -बिहारी लाल के दोहों के साथ तैयार हैं!

मेरे साथ बने रहिए....

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