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श्रावण कृष्ण द्वितीया (अशून्यशयन व्रत) का महात्म्य एवं व्रत-विधान
राजा शतानीक ने कहा— हे मुने! कृपा करके आप फल द्वितीया का विधान बताइए, जिसके करने से स्त्री विधवा नहीं होती तथा पति-पत्नी का परस्पर वियोग भी नहीं होता।
सुमन्तु मुनि ने कहा— हे राजन्! मैं अब फल द्वितीया का विधान कहता हूँ। इसी का नाम अशून्यशयन द्वितीया भी है। इस व्रत को विधिपूर्वक करने से स्त्री विधवा नहीं होती और स्त्री-पुरुष का परस्पर वियोग भी नहीं होता।
क्षीरसागर में लक्ष्मीजी के साथ भगवान श्रीविष्णु के शयन करने के समय यह व्रत किया जाता है। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया के दिन लक्ष्मीजी के साथ श्रीवत्सधारी भगवान श्रीविष्णु का पूजन करके हाथ जोड़कर इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए—

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