11 saat - çevirmek

अपनों की राह तकते-तकते जब उम्र की ढलान आ जाए, तो हर आहट में सिर्फ एक उम्मीद बची रह जाती है। भोपाल के 'अपना घर' वृद्धाश्रम की चौखट पर बैठी 80 साल की अंजलि श्रीवास्तव की आंखें पिछले एक दशक से हर गुरुवार को बस दरवाजे की तरफ ही टिकी रहती हैं। जब आंखों की रोशनी धुंधली पड़ने लगी थी और मोतियाबिंद की तकलीफ बढ़ गई थी, तब मंदिर के पास से एक मिठाई वाले ने सहारा देकर उन्हें इस आश्रम में पहुंचाया था। कुछ वक्त बाद बेटा मिलने भी आया, मगर रुखसत होते वक्त कह गया कि अगले गुरुवार को आऊंगा। वह एक वादा आज 10 साल बीत जाने के बाद भी पूरा नहीं हो सका, लेकिन मां की उम्मीदें आज भी उसी गुरुवार पर थमी हुई हैं।
इस आश्रम के हर कमरे में आंसुओं और इंतज़ार की ऐसी ही अनगिनत दास्तानें दबी पड़ी हैं, जहां कोई फोन की एक घंटी के लिए तरस रहा है तो कोई अपनी औलाद का चेहरा एक आखिरी बार देखने की आस लगाए बैठा है। हाल ही में 4 अगस्त को 70 साल के घनश्याम जी की सांसें थम गईं और इस घटना ने वहां मौजूद हर बुजुर्ग के दिल को झकझोर कर रख दिया। इंदौर में कभी टायर-ट्यूब का बड़ा कारोबार चलाने वाले घनश्याम जी के दो बेटे और दो बेटियां थीं, पर आखिरी पलों में सिरहाने खड़ा होने वाला कोई अपना नहीं था। पूरे दो दिन तक उनका पार्थिव शरीर सिर्फ इसलिए रखा रहा कि शायद खून का कोई रिश्ता मुखाग्नि देने पहुंच जाए, लेकिन जब कोई नहीं आया तो पुलिस और आश्रम के सेवादारों ने ही नम आंखों से उनका अंतिम संस्कार किया।
इस विदाई ने आश्रम के बाकी बुजुर्गों के सीने में उस अनकहे खौफ को और गहरा कर दिया है कि मौत उतनी डरावनी नहीं होती, जितना आखिरी सांसों के वक्त अपनों का छोड़ जाना होता है। आश्रम की संचालिका माधुरी मिश्रा का कहना भी यही है कि कोई भी बुजुर्ग अपनी मर्जी से अपने आशियाने को अलविदा नहीं कहता, जब अपनी ही औलादें मुंह मोड़ लेती हैं, तब इन चारदीवारियों में रहने वाले बेगाने ही उनका सहारा और नया परिवार बन जाते हैं।

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