उत्तराखंड के अलग राज्य के आंदोलन की कहानी केवल 1990 के दशक के आंदोलनों से शुरू नहीं होती। इसके पीछे लंबे समय से चल रही सामाजिक जागरूकता, क्षेत्रीय पहचान, आर्थिक असमानता और स्थानीय अधिकारों की लड़ाई की एक लंबी परंपरा रही है। इसी वैचारिक यात्रा में बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल की जोड़ी का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
बद्रीदत्त पांडे ने अपनी पत्रकारिता, लेखन और जनजागरण के जरिए पहाड़ की समस्याओं को लोगों तक पहुंचाया, वहीं इंद्र सिंह नयाल ने कानून, संगठन और प्रशासनिक समझ के माध्यम से इन मुद्दों को मजबूती दी। दोनों की भूमिका अलग थी, लेकिन उद्देश्य एक—पहाड़ के लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना और क्षेत्र के विकास का रास्ता तैयार करना।
✍️ बद्रीदत्त पांडे और 🧑‍⚖️ इंद्र सिंह नयाल की ‘कलम-कानून’ की जोड़ी
1920 के दशक में कुमाऊं की समस्याओं को उठाने के लिए कुमाऊं परिषद एक महत्वपूर्ण मंच बनी। बद्रीदत्त पांडे इसके प्रमुख नेताओं में थे, जबकि युवा इंद्र सिंह नयाल भी इससे जुड़े। नयाल ने 1926 में एलएलबी पूरी की और कानून को पहाड़ के लोगों के अधिकारों की लड़ाई का माध्यम बनाया।
इन दोनों के काम करने का तरीका अलग था। पांडे जी अखबार और लेखन के माध्यम से जनता में राजनीतिक चेतना पैदा करते थे, जबकि नयाल जी कानूनी और संगठनात्मक स्तर पर लोगों के साथ खड़े रहते थे। इसी वजह से उनकी जोड़ी को ‘कलम और कानून’ के मेल के रूप में देखा गया।

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