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ये तस्वीर नहीं, हमारे समाज के लिए एक सवाल है…,

मात्र 10–20 रुपये कमाने के लिए तेज़ रफ्तार ट्रेन के पीछे नंगे पैर दौड़ता ये मासूम बचपन…

सोचिए, इसके पैरों में पत्थर चुभने से पहले कहीं इसकी उम्मीदें तो नहीं घायल हो रहीं? 💔

जिस उम्र में बच्चे को स्कूल की ओर दौड़ना चाहिए,

उस उम्र में मजबूरियां उसे रेल की पटरियों के किनारे दौड़ने पर मजबूर कर रही हैं,

किसी बच्चे का बचपन चंद रुपयों का मोहताज न हो,

हर हाथ में खिलौना हो, हर कंधे पर स्कूल बैग हो और हर बच्चे की आँखों में सपने हों—यही तो असली विकास है,

क्योंकि जिस देश का हर बच्चा शिक्षित होगा,
उसी देश की नींव मजबूत होगी और भविष्य बेहतर बनेगा, 🇮🇳

बचपन को मजदूरी नहीं, शिक्षा चाहिए,

मजबूरी नहीं, अवसर चाहिए,
रेल की पटरियां नहीं, स्कूल की राह चाहिए,

अगर आप भी मानते हैं कि हर बच्चे का शिक्षा पर अधिकार है, तो इस आवाज़ को आगे बढ़ाइए।