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एक वक्त था जब हर साल हज़ारों बच्चे पोलियो की वजह से हमेशा के लिए अपने पैरों पर चलने से रह जाते थे। किसी माँ की गोद में बैठा हँसता बच्चा एक बुखार के बाद फिर कभी खड़ा नहीं हो पाता था।

फिर देश ने ठान लिया। 1995 में पल्स पोलियो अभियान शुरू हुआ, और गली-गली, गाँव-गाँव "दो बूँद ज़िंदगी की" पहुँची। स्वास्थ्यकर्मी धूप, बारिश और दूरी की परवाह किए बिना हर दरवाज़े तक गए।

और 2014 में भारत को पोलियो-मुक्त घोषित किया गया। 🇮🇳

पर जंग अभी खत्म नहीं हुई। दुनिया के कुछ हिस्सों में यह वायरस अब भी मौजूद है, इसलिए हर बच्चे का टीका ज़रूरी है।

आज विश्व पोलियो दिवस पर पक्का कीजिए कि आपके घर और आसपास का कोई बच्चा टीके से छूटे नहीं। 💉

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