आज बाबा विश्वनाथ जी की पावन नगरी काशी में, माँ गंगा के पवित्र तट पर स्थित कांची शंकराचार्य मठ, हनुमान घाट में आयोजित श्री शुक्ल यजुर्वेद कण्ठस्थ दण्डक्रम पारायण के इस ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक अनुष्ठान में उपस्थित होना मेरे लिए अत्यंत सौभाग्य, गौरव और आत्मिक आनंद का विषय है।
काशी केवल एक नगर नहीं है। काशी भारत की सनातन चेतना है। काशी ज्ञान की भूमि है, तपस्या की भूमि है, अध्यात्म की भूमि है और वेदों की अमर परंपरा की जीवंत धरोहर है।
यह वही काशी है, जहाँ सदियों से ऋषियों, मुनियों, आचार्यों और विद्वानों ने अपनी साधना से भारतीय संस्कृति एवं सनातन धर्म की ज्ञान-परंपरा को समृद्ध किया है।
वेद हमारी संस्कृति की आत्मा हैं। वेद हमारी सभ्यता की आधारशिला हैं। वेद केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन को सत्य, धर्म, कर्तव्य और सदाचार का मार्ग दिखाने वाले शाश्वत ज्ञान के स्रोत हैं।
आज के इस आयोजन की विशेषता यह है कि हमारे युवा वेदोपासक ब्रह्मचारी अपनी अद्भुत स्मरण शक्ति, कठोर साधना, अनुशासन एवं गुरु-परंपरा के प्रति समर्पण से वेदों की अत्यंत जटिल और विशिष्ट पारायण पद्धति का निर्वहन कर रहे हैं।
17 वर्ष एवं 13 वर्ष की अल्पायु में वेदों के गहन अध्ययन और कण्ठस्थ साधना का यह उदाहरण हम सभी के लिए प्रेरणादायी है।
यह साधारण उपलब्धि नहीं है। इसके पीछे वर्षों की साधना, गुरुजनों का मार्गदर्शन, संयमित जीवनचर्या और अटूट संकल्प निहित है।
मैं इन दोनों युवा वेदोपासकों को हृदय से साधुवाद देता हूँ। इनके पूज्य गुरुजनों एवं अभिभावकों को भी कोटि-कोटि नमन करता हूँ, जिन्होंने इन बाल ब्रह्मचारियों को भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए तैयार किया है।
मैं महर्षि वेदव्यास प्रतिष्ठान, पुणे के समस्त आयोजकों को भी इस अद्भुत वैदिक अनुष्ठान के आयोजन के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ देता हूँ।
हर-हर महादेव!
जय माँ गंगे!
जय सनातन संस्कृति!
भारत माता की जय!


