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हरिद्वार कब पहुंचना था ये निश्चित नहीं था। यात्रा मार्ग में एक स्थान पर बस की लाइट काम करना बंद कर दी थी जिसके कारण 15-16 घण्टे की देरी हुई। आगे मार्ग पर पत्थर गिर जाने के कारण 5 घण्टे की और देरी हुई। इस सबके कारण हरिद्वार पहुंचने का समय परिवर्तित हो गया।
मैंने सोचा था कि हरिद्वार में पहुंचकर एक रूम ले लूंगा और एजेंट से तत्काल का टिकट लेकर मुम्बई वापस आ जाऊंगा। उसी रात जगदम्बा की कृपा से ग्रुप में बद्री प्रसाद उनियाल जी का एक सन्देश देखा जिसमें वो अमित शर्मा भैया से हरिद्वार में मिलने की बात कर रहे थे। तब मुझे स्मरण हो आया कि बद्री भाई तो हरिद्वार में ही हैं। बद्री भाई से जयपुर में मिलना भी हो चुका था और राव साहेब के हम दोनों स्नेही रहे हैं। मैंने बद्री भाई को कॉल किया और अगले दिन उनके घर पर पहुंच गया।
सामान रख कर मैं अपने ग्रुप के साथ मनसा देवी, चंडी धाम के दर्शन को गया। तभी पता चला कि ग्रुप में एक जन को गंगाजल चाहिए और तब मैंने बद्री भाई को कॉल करके अपनी समस्या बताई। बद्री भाई विकट धूप में 5 लीटर गंगा जल लेकर पहुंच गये। उन लोगों को बस में छोड़कर मैं बद्री भाई के साथ उनके घर पर आ गया।
अगले दिन रुकना था क्योंकि तत्काल की विंडो अगले दिन ही खुलती। दूसरे दिन अमित छिल्लर भैया का आगमन था जिसके कारण गंगा तट पर संध्या के अतिरिक्त अन्य कोई योजना नहीं थी। दुर्भाग्य से अमित छिल्लर भैया आये तो किन्तु कुछ स्वास्थ्य कारणों से उन्हें जाना पड़ा। साथ ही मेरा टिकट भी नहीं हुआ था।
उस रात हम दोनों भाई आपस में ढेर सारे विषयों पर बात करते रहे। बद्री भाई मेरे गुरु भाई भी हैं तो अधिकतर बातें उसी से सम्बद्ध रही। तीसरे दिन हम लोग गये थे काली कामराज माता के दर्शन को पर वहीं से एक सड़क को देखकर दोनों का मन बन गया कि इस सड़क का मार्ग पता करते हैं। एक स्थानीय ने बताया कि ये सड़क ऋषिकेश जाती है और हम दोनों ऋषिकेश को निकल लिये।
मार्ग में नीलकंठ महादेव के लिये साइन बोर्ड देखा तो तय हुआ कि उनका दर्शन करने चलते हैं। हरिद्वार से ऋषिकेश के मध्य एक नहर है जिसके किनारे की सड़क और साथ में राजाजी राष्ट्रीय उद्यान का साथ बहुत रमणीक है। उसे देखकर मेरे मन में आया कि लगे हाथ मैं भी बाइक चला लूं। बद्री भाई को मेरे जैसे नौसिखिए पर विश्वास था और यात्रा आरम्भ हो गई।
नहर के समाप्त होते ही पहाड़ों की सर्पीली सड़क आरम्भ हो गई जिस पर बाइक चलाने का ये मेरा प्रथम अनुभव था। मजे की बात ये है कि बद्री भाई भी उस सड़क से पहली बार जा रहे थे। ये सबसे पुरानी सड़क थी जो नई सड़क की अपेक्षा संकरी और वलयाकार है। बाइक तीसरे गियर में चल रही थी। कभी दूसरा कभी तीसरा गियर लगाते लगाते गरुड़ चट्टी पहुंचा। तब स्मरण हो आया कि इसी गरुड़ चट्टी के समीप किसी पहाड़ी पर स्वामी विष्णुतीर्थ महाराज बैठकर शिवोम तीर्थ महाराज को उपदेश दिये थे। वहां से लगभग 24-25 किलोमीटर और ऊपर नीलकंठ महादेव का मन्दिर था। बद्री भाई ने बताया कि उसी के समानांतर योगी आदित्यनाथ जी का पैतृक गांव एवं बद्री भाई का भी गांव है। नीलकंठ महादेव का दर्शन करने उस दिन बाबा रामदेव भी आये थे।
दर्शन उपरान्त हम दोनों लौट आये। अगले दिन हमने कनखल की यात्रा की और रजनीश प्रयाग जी से बाबा रामदेव के संकुल 2 में भेंट की। रजनीश प्रयाग जी संकुल 2 के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं और हम दोनों का आतिथ्य सत्कार इतने अपनत्व से किया कि मन गदगद हो गया। रजनीश प्रयाग जी जिस पद पर हैं, उस पद पर बैठे व्यक्ति के अन्दर इतनी सरलता देख तुलसी बाबा की चौपाई स्मरण हो आई कि फलदार वृक्ष नम्रता से झुक जाते हैं अन्यथा इतने बड़े संकुल का कार्यकारी अधिकारी प्रभुता पाकर मदमत्त हो जाता।
कनखल में दक्षराज मन्दिर आदि का दर्शन कर हम लोग एक पुस्तक की दुकान पर गये जो हर की पौड़ी पर है। उसके पश्चात घर वापस आ गये।
इस सबके बीच कुछ बातें जो बद्री भाई के बारे में हैं, उन्हें कहने से अपने को रोक नहीं पा रहा। बद्री भाई को धूप में निकलने की मनाही है उस पर भी बद्री भाई लगातार 3 दिन धूप में ही मेरे साथ रहे। मुझे कुछ स्वास्थ्य की समस्या थी तो बद्री भाई ने पथ्य का ध्यान रखकर उसी के अनुसार भोजन बनवाया।
इन तीन दिन बद्री भाई ने मुझे लगने ही नहीं दिया कि मैं अपने घर में नहीं हूं। बद्री भाई बहुत संकोची, मितभाषी हैं। पर मेरे साथ बहुत खुलकर बात करते रहे। बहुत सारी बातें जिन्हें हम साझा नहीं कर सकते वो हमारे बीच हुई।
बद्री भाई ने हरिद्वार के सप्तशृंगी विद्यालय से आचार्य पद का कोर्स किया है और कर्मकाण्ड करवाने में प्रवीण हैं। चूंकि बद्री भाई श्रीविद्या में उपदेशित हैं और नित्य संध्या वंदन करते हैं, इस कारण इनके द्वारा करवाये गये कर्मकांड का फल यजमान को अधिक मिलेगा ऐसा मेरा विश्वास है।
कभी किसी को हरिद्वार जाना हो और बद्री भाई से मिलना हो या कोई कर्मकाण्ड करवाना हो तो मुझसे निःसंकोच इनबॉक्स में सम्पर्क कर सकते हैं।
चित्र ऋषिकेश का है। नीचे पतित पावनी गंगा मैया बह रही हैं। नीलकंठ जाते समय गरुड़ चट्टी से पहले रुककर एक फोटो लिया था।

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स्वनाथ वामभागस्थाम् वराभयकराम्बुजाम्।
नमस्ते देवदैवेषी भक्त वत्सलवत्सलाम्।।

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हमारे आस पास के गाँवो में शहर में अच्छी कमाई करने वाली युवा पीढ़ी घर बनवा रही है।
यह अच्छी बात हैं कि वह गाँव नहीं भूले हैं।
लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा कहें या अज्ञानता। वह शहरी वास्तुकला से घर बनवा रहें हैं। ऊंची ऊंची बिल्डिंग। यह जो बनवा रहें हैं, घर नही है। वह मकान है, जिसमें किरायेदार रहतें हैं।
उनको यह पता नहीं कि गांवों की पारंपरिक वास्तुकला में घर के हर कमरे आँगन में खुलते थे। यह घर था, जिसमें परिवार रहता था।

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आज थोड़ा सा आपको झेलना पड़ेगा।😊 रक्तदान शिविर।।

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