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20 वीं सदी के दक्षिण भारत के महान क्रांतिकारी संत, #नारायणा_गुरु जी के परिनिर्वाण दिवस पर शत्-शत् नमन एंव विनम्र श्रध्दांजलि |
‘‘जाति —
——
स्वीकार्य नहीं मुझे
जाना, मृत्यु के बाद
तुम्हारे स्वर्ग में।
वहां भी तुम
पहचानोगे मुझे
मेरी जाति से ही!
‘‘इस कविता के माध्यम से ओमप्रकाश वाल्मीकि जी उन तमाम बंधनों से मुक्त होने की जिस आकांक्षा को रखते हैं,उससे सच में एक क्रांति की लहर फूटने वाली लगती है |