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यह संसार मेरी अपेक्षा से चले, इससे ही तो क्रोध पैदा होता है। जिस-जिस को तुमने अपनी अपेक्षा से चलाना चाहा, उसी पर क्रोध होता है। इसलिए जिनसे तुम्हारी जितनी ज्यादा अपेक्षा होती है, उनसे तुम्हारा उतना ही क्रोध होता है। पत्नी पति पर आग-बबूला हो जाती है; हर किसी पर नहीं होती। हर किसी पर होने का सवाल ही कहां है? अपेक्षा ही नहीं है। जिससे अपेक्षा है.। बाप बेटे पर क्रोधित हो उठता है--अपेक्षा है। बड़ी आशाएं बांधी हैं इस बेटे से और यह सब तोड़े दे रहा है। सोचा था, यह बनेगा, वह बनेगा, बड़े सपने देखे थे--और यह सब उलटा ही हुआ जा रहा है।
जिससे तुम्हारी अपेक्षा है, ध्यान रखना वहीं-वहीं क्रोध पैदा होता है। जिनसे तुम्हारे कोई संबंध नहीं हैं, कोई क्रोध पैदा नहीं होता। पड़ोसी का लड़का भी बर्बाद हो रहा है, वह भी शराब पीने लगा है--मगर इससे तुम्हें चिंता नहीं होती।
ओशो।
#महावीर गुजर रहे हैं एक रास्ते से। लोग कहते हैं,
वहां से मत जाएं, वहां एक भयंकर सर्प है।
वहां से कोई जाता नहीं। राह निर्जन हो गई है।
सर्प बहुत भयंकर है और हमले करता है।
दूर से फुफकार मार देता है, तो आदमी मर जाता है।
तो महावीर कहते हैं, जब वहां से कोई भी नहीं जाता,
तो सर्प के भोजन का क्या होगा?
अगर आपसे किसी ने कहा होता कि
उस रास्ते पर सर्प है, सर्प को छोड़ो, चूहा है,
उधर से मत जाएं, चूहा बड़ा खतरनाक है,
तो आपको जो पहला खयाल आता वह अपना आता
कि जाना कि नहीं। महावीर को पहला खयाल सर्प का
आया कि भूखा तो नहीं होगा। यह अस्मिता गल गई,
गली जा रही है, यहां मैं का खयाल ही नहीं आता;
उसका खयाल आ रहा है कि फिर तो जाना ही पड़ेगा।
महावीर ने कहा, भला किया कि तुमने बता दिया।
जाना ही पड़ेगा। अगर मैं न जाऊंगा, तो फिर कौन जाएगा?
तो महावीर उस सर्प को खोजते हुए पहुंचते हैं।
मीठी कथा है कि सर्प ने उनके पैर में काट लिया,
तो कथा है कि खून नहीं निकला, दूध निकला।
दूध निकल सकता नहीं पैर से। लेकिन यह काव्य-प्रतीक है! दूध प्रेम का प्रतीक है, मां का प्रतीक है। सिर्फ मां के पास संभावना है कि खून दूध हो जाए। और मनसविद कहते हैं कि अगर मां प्रेम से बिलकुल क्षीण हो जाए, तो उसके भीतर भी खून दूध में परिवर्तन नहीं होगा।
वह परिवर्तन भी इसलिए संभव है कि उसका
अति प्रेम ही उसके अपने खून को अपने प्रेमी के लिए,
अपने बच्चे के लिए दूध बनाता है, भोजन बना देता है।
यह सिर्फ प्रतीक है कि महावीर के पैर में
काटा सांप ने, तो वह दूध हो गया। इस प्रतीक
को पूरा तभी समझ सकेंगे, जब समझें कि
महावीर ने कहा कि सांप भूखा होगा। और मैं नहीं
जाऊंगा, तो कौन जाएगा? यह ठीक मां जैसी पीड़ा है,
जैसे बच्चा भूखा हो। इसलिए यह प्रतीक है कि उनके
पैर से दूध बहा। दूध तो बहेगा नहीं; लेकिन महावीर के पैर से खून भी बहा हो, तो वह ठीक वैसे ही दूध जैसा
बहा जैसे मां का प्रेम बहता हो भूखे बच्चे के प्रति।
यह अस्मिता का विसर्जन है, मैं का भाव नहीं है।
ओशो : ताओ उपनिषद ( प्रवचन--34)