ऑंंखे..... मन के कोने तक पहुंच जाती है जब-जब तुम्हारी ऑंखें। पढ़ लेती हमारे अनकहे भावो को जब -जब तुम्हारी ऑंखें। स्पर्श गहरा होता छू लेता मेरे अंतरतम सूने हृदय को जब जब जीवन पावन लगता जब मेरे मन की बोलती तुम्हारी ऑंखें ।
प्रार्थना हे वाणी! मेरे हृदय से निकल बाल्मीकि की पीड़ा बन वेदना कह जाओ हो भाव घनेरे सुंदर रागों की बीना से मधुरम झंकार बन जग छा जाओ हो सुंदर निर्मल अनुपम अटल से भाव हमारे हिंदी की वह धारा बन जाए हिंदी की बिंदी बनकर सभी भाषाओं में माथे का चंदन बन जाओ आभा