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वो भी क्या दिन थे कैसेट चलती चलती उलझ जाया करती थी फिर उसे सुलझाते थे फिर चलती थी । बाजार से कैसेट में गाने भराकर लाते थे फिर घर लाकर जोर जोर की आवाज में चलाते थे ताकि पड़ोसी को पता चल जाए की नई कैसेट भरवाई है किस किस ने ये दिन देखे है

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इसे बोलते है नौटंकी ।
समझ ना आई तो गिन लो

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गोमती नगर लखनऊ में ये हुडदंग मचाने वाले चेहरे हैं

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हर 5-10 गाँव के बीच "कोंवेंट" और "मदरसे" हैं पर सैकड़ों सैकड़ों किलोमीटर के बीच कोई "गुरुकुल" नहीं मिलता
हर गली चौराहे पर मजार ,मस्जिद है पर कई कई गांवों के बीच कोई यज्ञशाला नहीं मिलती
मजारों पर चादर चढाते,सर रगड़ते रोज लाखों जाते है ,यज्ञ कितने करते हैं
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जींस लटकाए बुड्ढे दिखाई देते हैं ,धोती वाले बाबा अब लुप्त हो गए हैं और हम अभिमान करते हैं कि सनातनियों को कोई मिटा नहीं सकता
वैसे और किस तरह मिटना चाहते हो ????
पग पग भूमि और घर घर से सनातन संस्कृति नष्ट हो गयी,क्या अभी कुछ और शेष है ???
जिस व्यक्ति के अन्दर सनातन संस्कृति नहीं क्या उसे भी सनातनी कहोगे ????
वो व्यक्ति वो घर सनातनी नहीं जिस के घर गाय ना हो जिस के घर यज्ञ ना हो तुम्हारे अन्दर का
सनातनी उसी दिन मर गया था जिस दिन तुम्हारे घर से "यज्ञ की अग्नि" और "गाय" को निकाल दिया था ,अब तो तुम्हारा कोरा भ्रम है कि तुम सनातनी हो

क्यों झूठा घमंड करते हो नादानों ????
ये झूठा भ्रम भी ज्यादा दिन नहीं कर पाओगे

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