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जब छत्रपति शिवाजी महाराज ने सूरत पर आक्रमण किया, तब सूरत के किलेदार इनायत खां ने षड्यंत्र करके एक दूत के जरिए शिवाजी महाराज को मरवाने का प्रयास किया।
शिवाजी महाराज ने दूत से कहा कि "तुम्हारा सर्दार एक औरत की तरह मुंह छुपा कर बैठा है। उसे लगता है कि मैं उसकी शर्तें मान लूंगा ?"
दूत ने कहा "हमारे सर्दार औरत नहीं हैं। मुझे आपसे और भी कुछ कहना है।"
ये कहकर दूत खंजर लेकर शिवाजी महाराज की तरफ लपका, तभी वह एक अंगरक्षक के हाथों मारा गया।

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पारिवारिक यात्रा 🥰

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मनोज कुमार: बॉलीवुड के राष्ट्रीय गौरव और आदर्शों के ध्वजवाहक - भारतीय सिनेमा के इतिहास में, कुछ सितारे ऐसे चमके जिन्होंने केवल मनोरंजन ही नहीं दिया, बल्कि समाज का आईना दिखाया और सकारात्मक बदलाव की लहर लाने का प्रयास किया. मनोज कुमार ऐसे ही एक अभिनेता थे. उनके अभिनय की धाक, देशभक्ति की गूंज, और सामाजिक सरोकारों को उठाने का जज्बा उन्हें सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के आदर्श के रूप में स्थापित करता है.
24 जुलाई 1937 को पाकिस्तान के एबटाबाद में जन्मे मनोज कुमार का असली नाम हरि कृष्ण गोस्वामी था. विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आया और दिल्ली में बस गया. बचपन से ही उन्हें अभिनय का शौक था. 1954 में मुंबई आकर उन्होंने फिल्मों में किस्मत आजमाने का फैसला किया.
शुरुआती दौर में उन्हें छोटे-मोटे रोल मिले. 1957 में आई फिल्म "फैशन" से उन्होंने बतौर मुख्य कलाकार डेब्यू किया. हालांकि, सफलता उनके पीछे ही चल रही थी. "हरियाली और रास्ता" (1962) और "वो कौन थी?" (1964) जैसी फिल्मों में उनकी दमदार भूमिकाओं ने उन्हें पहचान दिलाई.
1965 में आई फिल्म "शहीद" मनोज कुमार के जीवन और करियर में मील का पत्थर साबित हुई. भगत सिंह की भूमिका निभाकर उन्होंने दर्शकों के दिलों में देशभक्ति की ज्वाला जगा दी. उनका क्रांतिकारी तेवर, देशप्रेम से सराबोर संवाद, और सशक्त अभिनय ने उन्हें राष्ट्रीय हीरो का दर्जा दिला दिया.
"शहीद" की अपार सफलता के बाद मनोज कुमार ने देशभक्ति और सामाजिक सरोकारों को अपनी फिल्मों का केंद्र बना लिया. "उपकार" (1967) में उन्होंने एक ईमानदार किसान की भूमिका निभाकर शहरी-ग्रामीण भेदभाव और शोषण का मुद्दा उठाया. "पूरब और पश्चिम" (197 में उन्होंने पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण पर कटाक्ष किया और भारतीय संस्कृति के महत्व को रेखांकित किया.
मनोज कुमार ने केवल देशभक्ति और सामाजिक मुद्दों तक ही सीमित नहीं रहे. "क्रांति" (1981) में उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई. "रोटी कपड़ा और मकान" (1974) में उन्होंने गरीबी और बेरोजगारी की समस्याओं को उजागर किया. "शोर" (1972) में उन्होंने शिक्षा व्यवस्था की खामियों को दर्शाया.
अभिनय के अलावा मनोज कुमार ने कुछ फिल्मों का निर्देशन भी किया. "शोर" जैसी उनकी निर्देशित फिल्में भी सफल रहीं. उनके योगदान को सम्मानित करते हुए उन्हें 1999 में पद्म श्री और 2015 में भारत रत्न के समकक्ष माने जाने वाले दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
मनोज कुमार की विरासत बहुआयामी है। एक ओर, वे देशभक्ति और सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित कलाकार थे। उनकी फिल्मों ने देशभक्ति की भावना को जागृत किया और लोगों को सामाजिक मुद्दों के बारे में सोचने के लिए प्रेरित किया। "शहीद", "उपकार", और "क्रांति" जैसी फिल्में आज भी प्रासंगिक हैं और लोगों को प्रेरित करती हैं।
दूसरी ओर, मनोज कुमार एक दमदार अभिनेता और प्रभावशाली संवाद कलाकार थे। उनके संवाद आज भी लोगों की जुबान पर हैं। "मेरे देश की धरती", "ये देश हमारा है", और "कर्म ही पूजा है" जैसे संवाद आज भी लोगों को प्रेरित करते हैं।
तीसरी ओर, मनोज कुमार भारतीय संस्कृति और मूल्यों के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने अपनी फिल्मों में भारतीय संस्कृति और मूल्यों को बढ़ावा दिया। "पूरब और पश्चिम" और "रोटी कपड़ा और मकान" जैसी फिल्में भारतीय संस्कृति और मूल्यों के महत्व को दर्शाती हैं।
चौथी ओर, मनोज कुमार सामाजिक परिवर्तन के प्रेरणा स्त्रोत थे। उन्होंने अपनी फिल्मों के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन लाने का प्रयास किया। "शोर" और "पियार का तूफान" जैसी फिल्में सामाजिक मुद्दों को उठाती हैं और लोगों को सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रेरित करती हैं।
मनोज कुमार की विरासत आज भी जीवित है। उनकी फिल्में, उनके संवाद, और उनके आदर्श आज भी लोगों को प्रेरित करते हैं। वे भारतीय सिनेमा के एक स्तंभ हैं और उनकी विरासत हमेशा याद रखी जाएगी।
पदमसिंह पारस फिल्म निर्माता-निर्देशक
पारस फिल्म्स मीडिया प्रा०लि० दिल्ली

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