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जब भी कोई "चोटी" और "जनेऊ" को देखता है तो उनके मन में एक धारणा होती है कि ये ब्राह्मण है, और कई तो पूछ भी लेते है कि आप ब्राह्मण हो क्या?
लेकिन उन्हें जब पता चलता है कि ये जाट, गुर्जर, यदुवंशी, सैनी, बनिया, क्षत्रिय, वाल्मीकि, वनवासी तो वो पूछते है दूसरे कास्ट होकर "चोटी" क्यों रखते हो?
अब यहाँ एक सवाल खड़ा होता है!
क्या आप कभी किसी सरदार जी से पूछते हो कि "पगड़ी" क्यो बांधते हो?
किसी मौलाना से पूछते हो "टोपी" क्यों पहनते हो?
किसी ईसाई से पूछते हो यीशु का लोकेट क्यों पहनते हो?
सोच विचार कर देखिए आज कितने हिन्दू चोटी रखते है? कितने जनेऊ पहनते है?
कितने वेद, शास्त्र, उपनिषद, दर्शन, रामायण, महाभारत, सत्यार्थ प्रकाश, गीता आदि ग्रन्थ पढ़ते है?
हमारे पतन का कारण हम स्वयं है!
समाज में मुश्किल से कुछ प्रतिशत लोग है जो अपनी पहचान बनाए हुए है! उन्हें भी लोग अलग ही नजरिए से देखते है!
किसी अन्य को दोष देने से बेहतर है अपने आप मे सुधार करें, अपनी आने वाली पीढ़ी को संस्कारित करें। उन्हें मानवता का पाठ पढ़ाए अपने धर्म और संस्कृति को और ज्यादा गहराई से जानने के लिए अपने आस-पास के मंदिरों में जाएं वहां होने वाली गतिविधियों में भाग ले और अपने श्रेष्ठ ऋषियों-महर्षियों की विद्या यानी वेद विद्या को जानकर अपनी महान सनातन संस्कृति को अपनाएं
जब भी कोई "चोटी" और "जनेऊ" को देखता है तो उनके मन में एक धारणा होती है कि ये ब्राह्मण है, और कई तो पूछ भी लेते है कि आप ब्राह्मण हो क्या?
लेकिन उन्हें जब पता चलता है कि ये जाट, गुर्जर, यदुवंशी, सैनी, बनिया, क्षत्रिय, वाल्मीकि, वनवासी तो वो पूछते है दूसरे कास्ट होकर "चोटी" क्यों रखते हो?
अब यहाँ एक सवाल खड़ा होता है!
क्या आप कभी किसी सरदार जी से पूछते हो कि "पगड़ी" क्यो बांधते हो?
किसी मौलाना से पूछते हो "टोपी" क्यों पहनते हो?
किसी ईसाई से पूछते हो यीशु का लोकेट क्यों पहनते हो?
सोच विचार कर देखिए आज कितने हिन्दू चोटी रखते है? कितने जनेऊ पहनते है?
कितने वेद, शास्त्र, उपनिषद, दर्शन, रामायण, महाभारत, सत्यार्थ प्रकाश, गीता आदि ग्रन्थ पढ़ते है?
हमारे पतन का कारण हम स्वयं है!
समाज में मुश्किल से कुछ प्रतिशत लोग है जो अपनी पहचान बनाए हुए है! उन्हें भी लोग अलग ही नजरिए से देखते है!
किसी अन्य को दोष देने से बेहतर है अपने आप मे सुधार करें, अपनी आने वाली पीढ़ी को संस्कारित करें। उन्हें मानवता का पाठ पढ़ाए अपने धर्म और संस्कृति को और ज्यादा गहराई से जानने के लिए अपने आस-पास के मंदिरों में जाएं वहां होने वाली गतिविधियों में भाग ले और अपने श्रेष्ठ ऋषियों-महर्षियों की विद्या यानी वेद विद्या को जानकर अपनी महान सनातन संस्कृति को अपनाएं
जब भी कोई "चोटी" और "जनेऊ" को देखता है तो उनके मन में एक धारणा होती है कि ये ब्राह्मण है, और कई तो पूछ भी लेते है कि आप ब्राह्मण हो क्या?
लेकिन उन्हें जब पता चलता है कि ये जाट, गुर्जर, यदुवंशी, सैनी, बनिया, क्षत्रिय, वाल्मीकि, वनवासी तो वो पूछते है दूसरे कास्ट होकर "चोटी" क्यों रखते हो?
अब यहाँ एक सवाल खड़ा होता है!
क्या आप कभी किसी सरदार जी से पूछते हो कि "पगड़ी" क्यो बांधते हो?
किसी मौलाना से पूछते हो "टोपी" क्यों पहनते हो?
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सोच विचार कर देखिए आज कितने हिन्दू चोटी रखते है? कितने जनेऊ पहनते है?
कितने वेद, शास्त्र, उपनिषद, दर्शन, रामायण, महाभारत, सत्यार्थ प्रकाश, गीता आदि ग्रन्थ पढ़ते है?
हमारे पतन का कारण हम स्वयं है!
समाज में मुश्किल से कुछ प्रतिशत लोग है जो अपनी पहचान बनाए हुए है! उन्हें भी लोग अलग ही नजरिए से देखते है!
किसी अन्य को दोष देने से बेहतर है अपने आप मे सुधार करें, अपनी आने वाली पीढ़ी को संस्कारित करें। उन्हें मानवता का पाठ पढ़ाए अपने धर्म और संस्कृति को और ज्यादा गहराई से जानने के लिए अपने आस-पास के मंदिरों में जाएं वहां होने वाली गतिविधियों में भाग ले और अपने श्रेष्ठ ऋषियों-महर्षियों की विद्या यानी वेद विद्या को जानकर अपनी महान सनातन संस्कृति को अपनाएं

आज हम आपको ले कर आए है Utsav Grand Party Lawn में जिसको बहुत ही अच्छे तरीके से सजाया और सवारा है विक्रम सिंह जी ने अगर आपका कभी किसी तरह का कार्यक्रम करने का विचार बनता है तो आप एक बार दिए गए नंबर पर बात कर सकते ही भाई साहब का बहुत अच्छा मैनेजमेंट है और बहुत ही उचित दाम में यकीन मानिए आप एक बार इनको मौका दे कर देखना आपको निराश नहीं करेंगे और आपके सभी अतिथि आपके कार्यक्रम को देख कर बहुत खुश होंगे
धन्यवाद
🌹 🌷 ।। श्री ।। 🌷 🌹
जय सियाराम सुमंगल सुप्रभात प्रणाम बन्धु मित्रों। राम राम जी।
श्रीरामचरितमानस नित्य पाठ पोस्ट ३२७, बालकाण्ड दोहा ६५/१-४, हिमाचल की रौनक।
सरिता सब पुनीत जलु बहहीं।
खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं।।
सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा।
गिरि पर सकल करहिं अनुरागा।।
सोह सैल गिरिजा गृह आएं।
जिमि जनु रामभगति के पाएं।।
नित नूतन मंगल गृह तासू।
ब्रम्हादिक गावहिं जसु जासू।।
भावार्थ:- हिमाचल पर पार्वती के जन्म के बाद, सारी नदियों में पवित्र जल बहता है और पक्षी, पशु, भ्रमर सभी सुखी रहते हैं। सब जीवों ने अपना स्वाभाविक वैर छोड़ दिया और पर्वत पर सभी परस्पर प्रेम करते हैं। पार्वती के घर आ जाने से हिमाचल ऐसा शोभायमान हो रहा है जैसे रामभक्ति को पाकर भक्त शोभायमान होता होता है। पर्वत राज के घर नये नये मंगलोत्सव होते हैं, जिसका ब्रम्हादिक यश गाते हैं।
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