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चित्र में वामन से विराट होते विष्णु, विराट का पाद प्रक्षालन करते ब्रह्म लोक में ब्रह्मा,
और चरणोदक यानी सुर सरिता गंगा-वेग को जटाओं में धारण करते शिव दर्शनीय हैं।
प्रश्न यह है कि देने वाला दे और जिसको दिया जा रहा वह स्वीकार ही न करे तो देने की प्रक्रिया पूरी कहाँ हुई?
वैसे ही माँगने वाले ने माँगा और देने वाले ने दिया ही नहीं तो माँगना व्यर्थ गया, प्रक्रिया पूरी नहीं हुई !
बच्चे आजकल दिल देते हैं, फिर दिल उचटा तो ले तलाक, दे तलाक !
क्या ईश्वर को किया जाने वाला समर्पण भी ऐसा ही होता है ?
- नहीं, जब आपने दिया और ईश्वर ने स्वीकार कर लिया तो अब आप वापस चाहें भी तो मिलने से रहा..
भगवान भूत, वर्तमान, भविष्य तीन पग में नाप देते हैं, धर्म कर्म, सुख दुःख, शरीर, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार नाप देते हैं, भगवान की स्वीकृति के बिना समर्पण पूर्ण नहीं होता,
-किसका?
जिसके कुल में सनकादिकों के रूप में प्रहलाद प्रकट हुये हों, प्रहलाद के पुत्र हुये विरोचन, विरोचन के हुये बलि !
कथा विस्तार श्रीमद्भागवत महापुराण, आठवें स्कंध , पंद्रहवें से तेईसवें अध्याय में है, आप वहाँ दर्शन करें।
बलि की गिनती भागवत यानी भक्तों में होती है,
भागवत का ही छठा स्कंध, तीसरा अध्याय, 20 वां श्लोक आधार है।
बलि का समर्पण पूर्ण है, भगवान ने अन्तत: गरुड से कहा - बलि को रस्सी से बाँध दो,
ये दामोदर हैं, न किसी बंधन से स्वयं डरते, न अपने भक्तों में किसी भी बंधन का डर रहने देते हैं।
ठीक है, बलि का सब लिया पर दिया क्या ?
- क्या क्या गिनोगे ?
कृपा, दर्शन, लीला पात्रता, स्वयं गदापाणि हो पाताल के बारहो द्वारों पर एक ही रूप से द्वारपाल बन रक्षा करते हुये दर्शन देते रहते।
एक बार रावण पहुँच गया, बोला - अंदर जाना है, वामन ने ना कर दिया।
बोला - उठा कर पटक दूँगा, फिर भीतर चला जाऊँगा,
भगवान बामन ने पाँव के अंगूठे से जैसे फुटबाल को मार देते हैं वैसे रावण को किक मारा कि उछल कर लंका में गिरा, फिर कभी बलि का सामना करने नहीं आया ...
वाल्मिकी रामायण के अनुसार भगवान वामन के तेज से बलशाली बने बालकों ने रावण को पकड़कर महाराज बलि के गौशाला में बांध दिया था और रोज़ उसे मारते पीटते थे। जिसका पता चलने पर महाराज बलि ने रावण को छुड़ाया ।
तो लोग बोलते हैं कि भगवान ने बलि को छल लिया जबकि ऐसा है नहीं उन्होंने बलि को तो वो सब दे ही डाला जो वो इस यज्ञ के पूर्ण होने पर भी न पा पाते।
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