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दुख को दूर नही किया जा सकता ! न करना चाहिये।
दुख से ध्यान हटना चाहिये। मात्र हम यही कर सकते है। जो हम नही करते है।
जिसको कम करना है। या दूर करना है। उस पर ध्यान अधिक जाता है। फिर वह और बढ़ता है।
तो उपाय एक ही है।
दुख से ध्यान हटे।
ध्यान तब हटेगा, जब ध्यान कहीं और जाय।
वह है, सृजन।
सृजन, निर्माण नही है।
सृजन purposeless है।
वह कर्म जिसका कोई उद्देश्य ना हो।
वह पढ़ना भी सृजन, जिसके आधार पर कोई परीक्षा नही देनी हो। अपना ज्ञान न प्रदर्शित करना हो।
ऐसे वृक्ष को पानी देना भी सृजन है। जिससे फल लेने की चाह न हो।
ऐसा प्रेम भी सृजन है। जिसमे कोई चाह न हो।
दुख को दूर नहीं किया जा सकता ! न ही इसकी कोशिश करनी चाहिये।
दुख से ध्यान हटना चाहिये। मात्र यही हम कर सकते हैं। जो हम नहीं करते हैं।
जिसको कम करना है या दूर करना है, उस पर ध्यान अधिक जाता है। फिर वह और बढ़ता है।
तो उपाय एक ही है।
दुख से ध्यान हटे।
ध्यान तब हटेगा, जब ध्यान कहीं और जाये।
वह है, सृजन।
सृजन, निर्माण नहीं है।
सृजन purposeless है।
वह कर्म जिसका कोई उद्देश्य ना हो।
वह पढ़ना भी सृजन है, जिसके आधार पर कोई परीक्षा नहीं देनी हो। अपना ज्ञान न प्रदर्शित करना हो।
ऐसे वृक्ष को पानी देना भी सृजन है जिससे फल लेने की चाह न हो।