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समुद्र मंथन के समय, समुद्र को मथने के लिए मंदरांचल पर्वत का प्रयोग किया गया था, मंदार पर्वत आज भी बिहार के भागलपुर के निकट बांका जिला में स्थित है।
समुद्र मंथन के समय जो विष निकला, उस विष को भगवान शिव ने अपने गले में धारण किया, इस हलाहल को धारण करने के लिए जिस पात्र का प्रयोग किया था, वो यह शंख था, इस शंख से भोले बाबा ने अपने कंठ में विष धारण किया।
मंदार पर्वत पर आज भी यह शंख कुण्ड स्थित है, यह शंख शिवरात्रि के एक दिन पहले कुंड से ऊपर आ जाता है, बाकी दिनों ये कुंड के अंदर पड़ा रहता है ।
कुंड की गहराई का आज तक अवलोकन नही किया जा सका है।
गर्व करें अपने सनातन संस्कृति के गौरवपूर्ण इतिहास पर!
🚩ॐ नमः शिवाय🚩
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हनुमान चालीसा में वर्णित है "कानन कुण्डल कुंचित केसा। हाथ बज्र और ध्वजा बिराजे। कांधे मूंज जनेऊ साजे। शंकर सुमन केसरीनंदन।"
अर्थात् आप सुनहले रंग, सुंदर वस्त्रों, कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।आपके हाथ में बज्र और ध्वजा है और कंधे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।
अब आप ही निर्णय कीजिए कि "आदिपुरुष" का हनुमान इस किरदार से कितना न्याय कर रहा है? काले वस्त्रों में राक्षस लग रहा है! हम सभी सनातनी हिंदुओं के खिलाफ यह एक सुनियोजित षड्यंत्र है। "आदिपुरूष" जैसी फिल्मों के माध्यम से हमारी राष्ट्रीय पहचान,राष्ट्रीय गौरव और हमारी राष्ट्रीय छवि को धूमिल करने या फिर बदलने का कुत्सित प्रयोग किया जा रहा है। इस फिल्म में हनुमान और रावण समेत कई किरदारों की पहचान मिटाने का षड्यंत्र है।
सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि जब हमारी युवा पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी इस फिल्म को देखेगी तो वे हमारे पूजनीय हनुमान जी की किस छवि की कल्पना करेगी।लेकिन फैसला वर्तमान पीढ़ी को करना है कि ऐसी सनातन विरोधी शक्तियों को कैसे रोकना है??? अगर हम इन्हें रोक नहीं पाए,तो मैं अगली पीढ़ी को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराऊंगा।
क्या #boycottadipurush ही इसका समाधान है???