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पिताजी एक बड़ी सुंदर धार्मिक कथा सुनाते थे। आज के समय में प्रासंगिक है।
माधवाचार्य जी बड़े महान संत थे। एक बार राम कथा सुना रहे थे। उन्होंने कहा हनुमानजी जब अशोक वाटिका गये तो वहाँ सफेद पुष्प खिले थे।
रामकथा हो और माधावाचार्य जैसे ऋषि सुना रहे हो तो हनुमानजी वहाँ न हो , यह संभव नहीं है ।
हनुमानजी मनुष्यरूप में कंबल ओढ़े बैठे थे। वह खड़े हो गये।
बोले महराज क्षमा करिये , पुष्प सफेद नहीं, लाल थे।
माधावाचार्य जी बोले चुपकर बैठो सफेद ही थे।
हनुमानजी अपने वास्तविक रूप में आ गये, बोले मैं ही गया था। अब आप हमें ही बता रहे है।
माधावाचार्य जी, प्रणाम और वंदन किये। लेकिन अपनी बात पर अडिग रहे। बात बहुत आगे बढ़ गई।
माधावाचार्य जी बोले ठीक है। माता सीता की आराधना करते है। उन्हीं से पूछते है।
जगद्जननी प्रकट हुई , बोली बजरंगबली , माधावाचार्य जी ठीक कह रहे है, पुष्प सफेद ही थे।
अब हनुमानजी को आप जानते है, इस ब्रह्मांड में भगवान राम से अधिक किसी पर विश्वास नहीं था।
वह बोले हम नहीं मानते! यदि राम प्रभु कह दे तो स्वीकार कर लेंगें।
मर्यादापुरुषोत्तम भगवान राम के सम्मुख दोनों भक्त प्रस्तुत हुये, पूरे घटनाक्रम से अवगत कराया।
भगवान मंद मंद मुस्कराने लगे, अपने चरणों के पास बैठे हनुमानजी के सिर को सहलाते हुये बोले -
वत्स ! पुष्प तो सफेद ही थे। लेकिन तुमने देखा लाल ही था। यह इसलिए हुआ , क्योंकि जगतजननी कि दशा देखकर उस समय क्रोध से तुम्हारी आँखे लाल थी। सफेद पुष्प, लाल प्रतीत हो रहे थे। माधावाचार्य जी का मन शांत है। ध्यान , योग , भक्ति से वह पुष्प का यथार्थ रंग देख रहे है।
हनुमानजी चरणों पर गिर पड़े , बोले प्रभु सब कुछ जानते थे। यह हठ इसलिए था कि आपके मुखारविन्द्रों से कुछ सुन सकें।
इस कथा का निहतार्थ समझाते हुये पिताजी ने कहा, मनुष्य जिस भाव में होता है , उसको उसी रंग में सब कुछ दिखता है।
क्रोध , दुख , करुणा , प्रेम , अभिमान जिस रूप में भाव होगा।यह संसार वैसे ही दिखता है।
जन्माष्टमी !
कोई सामान्य धार्मिक उत्सव नहीं है।
वह जिनके विचार ने पूरी मानव सभ्यता को सबसे अधिक प्रभावित किये।
वह जो यह बताये धर्म का अर्थ उदासीनता से उपजा विचार नहीं ! उत्सव है।
वह जो नाचते है , वह जो गौ चराते है , वह जो सारथी है! वही धर्म भी है।
उनका प्रकटोत्सव है।
दर्शन कि महानतम ऊँचाई पर भगवान कृष्ण बंशी बजाते है।।