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उठो अर्जुन गांडीव उठाओ फिर कुरुक्षेत्र को जाना है
प्रत्यंचा पर तीर चढाओ ये संसार बचाना है
फिर शकुनी के पासे हैं फिर से द्युत के धंदे है
फिर दुर्योधन जाग उठा है फिर से राजन अंधे है
शिविर में छुप के जो बैठे हैं वे सेना के प्रमुख हुए
भीष्म पितामह बंधनमुक्त हैं विदुर भी नीति विमुख हुए
पहन के कुंडल और कवच को कर्ण स्वार्थ हैं बाँट रहे
उसी स्वार्थ की तलवारों से द्रोण अंगूठे काट रहे
अब न कोई कृष्ण तुम्हारा, तुमको चक्र घुमाना है
उठो अर्जुन गांडीव उठाओ फिर कुरुक्षेत्र को जाना है
साहस सबके कुंद पड़े हैं, धार कुंद है शस्त्रों पर
दुशासन के हाथ बढे फिर पांचाली के वस्त्रों पर
बना के पांडव अपना बैठे मुख मंडल लाचारों सा
अभिमन्यु भी रस्ता भूले चक्रव्यूह के द्वारों का
दिव्यदृष्टि पाकर के भूले दृष्टिहीन हैं संजय भी
धरमराज के धरम पे थोड़ा अब होता है संशय भी
हारें दोनों तरफ के कौरव ऐसा बाण चलाना है
उठो अर्जुन गांडीव उठाओ फिर कुरुक्षेत्र को जाना है
सारांश✍️