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भारत का बजट और एक कड़वी सच्चाई!
आंकड़े साफ बता रहे हैं— जहाँ हर वर्ग के उत्थान के लिए करोड़ों का बजट आवंटित किया गया है, वहीं सामान्य श्रेणी के लिए यह आंकड़ा शून्य नजर आता है।
सवाल यह है कि क्या सामान्य वर्ग की भूमिका सिर्फ टैक्स भरने तक सीमित रह गई है? क्या 'सबका साथ, सबका विकास' में सामान्य वर्ग शामिल नहीं है?
ऊपर से UGC जैसे काले कानून को और लागू कर दिया।

समाज को अब इस पर विचार करना होगा। आपकी इस पर क्या राय है? कमेंट में लिखें। 👇

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व्यवस्था का यह दोहरा चरित्र देखिए
क्या यही समानता है? यह सवाल हम सबका है।
जब देश के विकास और टैक्स देने की बात आती है, तो हम गर्व से 'हिन्दुस्तानी' होते हैं।
जब धर्म और राजनीति को समर्थन चाहिए होता है, तो हमें 'हिन्दू' कहकर याद किया जाता है।
लेकिन जब सरकारी योजनाओं, सुविधाओं और हक़ की बात आती है... तो अचानक हम 'सवर्ण' हो जाते हैं और कतार से बाहर कर दिए जाते हैं।
ऊपर से UGC जैसे काले कानून और लगा देते।

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From making life-saving drugs more affordable to creating 10,000 new medical seats, the Union Budget 2026-27 is prioritising your wellbeing. 🏥💊

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सशक्त किसान, समृद्ध भारत: बजट 2026-27 का नया संकल्प! 🌾 🚜

केंद्रीय बजट 2026-27, भारतीय कृषि के इतिहास में एक नया अध्याय लिखने जा रहा है।

"खेती का नया रोडमैप" न केवल किसानों की आय बढ़ाने वाला है, बल्कि कृषि को आधुनिक तकनीक और टिकाऊ संसाधनों से जोड़ने वाला है।

#viksitbharatbudget

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सशक्त किसान, समृद्ध भारत: बजट 2026-27 का नया संकल्प! 🌾 🚜

केंद्रीय बजट 2026-27, भारतीय कृषि के इतिहास में एक नया अध्याय लिखने जा रहा है।

"खेती का नया रोडमैप" न केवल किसानों की आय बढ़ाने वाला है, बल्कि कृषि को आधुनिक तकनीक और टिकाऊ संसाधनों से जोड़ने वाला है।

#viksitbharatbudget

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गाँव के बाहर फैले खेतों के बीच एक पुराना, टूटा-फूटा चौराहा था। कभी वहाँ यात्रियों की चहल-पहल रहती थी, पर अब समय की मार से वह बस एक पत्थर का ढेर बनकर रह गया था। उसी चौराहे पर आज एक अद्भुत दृश्य दिखाई दे रहा था।
लाल सिंदूर से लिप्त, वानर-मुख वाले हनुमान जी वहाँ शांति से सोए हुए थे। उनका विशाल शरीर चौराहे पर विश्राम कर रहा था, गदा पास ही रखी थी। आसपास फूलों की पंखुड़ियाँ और कुमकुम बिखरा हुआ था, मानो किसी अनदेखे भक्त ने रात में पूजा की हो।
दूर खेतों में किसान अपने बैलों के साथ हल चला रहे थे। मिट्टी की खुशबू और बैलों की घंटियों की आवाज़ वातावरण को पवित्र कर रही थी। किसान जानते थे—
“जब तक बजरंगबली यहाँ विश्राम कर रहे हैं, हमारे खेत सुरक्षित हैं।”
कहते हैं, एक बार इस गाँव में सूखा पड़ गया था। फसलें नष्ट होने लगीं, भय छा गया। उसी रात गाँव के बुज़ुर्ग ने स्वप्न में देखा कि हनुमान जी खेतों के चौराहे पर आकर सो गए हैं, ताकि भूमि की रक्षा कर सकें।
अगली सुबह बारिश हुई। धरती फिर से हरी हो उठी। तब से लोग मानने लगे कि हनुमान जी केवल युद्ध के देवता नहीं, बल्कि किसानों, खेतों और श्रम की रक्षा करने वाले देवता भी हैं।
आज भी जब कोई किसान उस चौराहे के पास से गुजरता है, तो सिर झुकाकर कहता है—
“सोते रहो बजरंगबली, जब तक आप यहाँ हैं, हमारा गाँव सुरक्षित है।”
और सच ही तो है—
जहाँ हनुमान जी का विश्राम होता है, वहाँ भय, अकाल और संकट स्वयं ही विश्राम कर लेते हैं।

(यह एक काल्पनिक प्रेरणादायक कहानी है)

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सीधी बात नो बकवास 👇
सेकुलरिज्म का बुखार इंसान को चुटिया बना देता है

यह वही उत्तराखंड का मोहम्मद दीपक है जिसकी राहुल गांधी और कांग्रेस और पूरा सेकुलर सूअर वामपंथी लॉबी खूब तारीफ कर रही है

अब इस मुर्ख को यह भी नहीं पता कि इंडिया गेट पर जो नाम लिखे गए हैं वह देश भक्तों के नाम नहीं है बल्कि अगर सीधी शब्दों में कहें तो देश के गद्दारों के नाम है

यानी कि यह उन लोगों के नाम है जो प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों के लिए लड़े थे यानी यह अंग्रेजो के सैनिक हैं

अब यह खुद ही उत्तर दे रहा है की गद्दार कौन है अंग्रेजों का स्वामीभक्त कौन है

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