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अर्धांगिनी के स्नेहिल मनुहार पर गढ़वाली परिधान में हुई यह सजधज। कवि को हाथ में कलम की जगह तलवार उठानी पड़ी। अर्धांगिनी छोटी बच्ची की तरह आह्लादित हो गईं।
कवि को और क्या चाहिए!

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हमें स्मरण रखना चाहिए कि हास-परिहास और उपहास में महज़ संवेदना की सात्विकता व शुचिता का एक बेहद बारीक फ़र्क़ होता है।

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तेरी दुनिया, तेरी उम्मीद तुझे मिल जाए,
चाँद इस बार तेरी ईद तुझे मिल जाए,
जिसकी यादों में चराग़ों सा जला है शब-भर,
उस सहर-रुख़ की कोई दीद तुझे मिल जाए।”..
ईद मुबारक 💐💐🙏

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#मनहर... एक नजर...
रंगों से सराबोर ,मार्च अंक अर्थात "रंगरश्मिता सद्भावोत्सव विशेषांक" के लोकगीतम पृष्ठ पर पढ़िये-
"ब्रज की होली और संबद्ध लोक गीत"

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मनहर के हाथों में मनहर❤️

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