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आप सभी को आषाढ़ माह की अष्टमी तिथि / जून महीने के तीसरे बुधवार, मासिक कालाष्टमी, मासिक कृष्ण अष्टमी की हादिँक शुभकामनाएँ ||
एवम्
शौर्य और बलिदान की प्रतिमूर्ति झांसी की रानी लक्ष्मी बाई जी की बलिदान दिवस पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।।
खुब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।
ॐ गं गणपतये नमो नम:
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दंति प्रचोदयात्।
हे गणपति मुझको बुध्दि दो,
लम्बोदर मुझको सिध्दि दो,
विघ्न न आए काम में,
शुभ और लाभ की वृद्धि दो।
रिद्धि सिद्धि के तुम हो दाता,
दीन दुखियों के भाग्य विधाता,
तुझमें ज्ञान-सागर अपार,
प्रभु कर दो मेरी नैया पार।
श्री काल भैरव
ॐ ह्रीं वां बाटुकाये, क्षौं क्षों अपदुध्दाराणाये,
कुरु कुरु बटुकाये, ह्रीं बटुकाये स्वहा।
[]भगवान भोलेनाथ जी माता पार्वती जी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी एवं प्रथम पूज्यनीय श्री गणेश जी की कृपा सदैव आप सभी पर बनीं रहें

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#हिंदू_धर्म_में_कालाष्टमी_व्रत_का_विशेष_महत्व_है
वैदिक पंंचांग के अनुसार यह व्रत हर महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। यह दिन काल भैरव को समर्पित होता है। काल भैरव भगवान शिव के अवतार माने जाते हैं। साथ ही काल भैरव को काशी का कोतवाल कहा जाता है।
मान्यता है विशेष कामों में सफलता पाने के लिए व्रत रखा जाता है।
इस व्रत को करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
जो 18 जून को पड़ रहा है। वहीं इस दिन भैरव स्तुति का पाठ करने से हर संकट से मुक्ति मिल सकती है।

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क्यों भगवान जगन्नाथ को लगाते हैं मालपुए का भोग❓❓
पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा भारत के सबसे भव्य और महत्वपूर्ण धार्मिक यात्रा है। यह पर्व हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को मनाया जाता है, जिसमें भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर जाते हैं। इस नौ दिवसीय यात्रा के दौरान भगवान को तरह-तरह के भोग लगाए जाते हैं, जिनमें मालपुआ का विशेष स्थान है॥
भगवान जगन्नाथ को मालपुआ बहुत ज्यादा प्रिय है, और यह परंपरा दशकों पुरानी है। रथ यात्रा के दिन, जब भगवान अपने भाई-बहन के साथ रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं, तो उन्हें विशेष रूप से मालपुए का भोग लगाया जाता है। यह मालपुआ केवल रथ यात्रा के दिन ही बनाया जाता है और भगवान को अर्पित करने के बाद भक्तों में बांटा जाता है।
खास बात यह है कि भगवान जगन्नाथ के लिए ये विशेष मालपुए छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले से लाकर चढ़ाए जाते हैं।
मालपुआ भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण का प्रतीक है।
हिंदू धर्म में मालपुआ को समृद्धि और शुभ्रता का प्रतीक माना जाता है, किसी भी शुभ काम या त्योहार पर मालपुआ बनाना चढ़ाना शुभ माना जाता है।
ऐसा माना जाता है कि मालपुए का भोग भगवान के मन को खुश करता है और उनकी रथ यात्रा मंगलमय होती है। यह यात्रा एक लंबी और महत्वपूर्ण यात्रा है, और इस दौरान भगवान को उनका पसंदीदा भोजन जरूर चढ़ाना चाहिए।
भगवान और भक्तों के बीच का संबंध बहुत गहरा है।
मालपुआ जैसी पारंपरिक और घर में बनी मिठाई का भोग लगाने से रिश्तों में मधुरता आती है।
भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि परंपरा, प्रेम और भक्ति का एक साक्षात उदाहरण है। मालपुए का भोग इस यात्रा का एक अभिन्न अंग है, जो भक्तों की श्रद्धा और भगवान के प्रति उनके गहरे प्रेम को दर्शाता है।
इस प्रसाद को पाने के लिए भक्त घंटों भीड़ में खड़े रहते हैं, यह सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि भगवान का आशीर्वाद है॥
॥हवा की उल्टी दिशा में लहराती है जगन्नाथ मंदिर की पताका॥

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जय मां सुरकंडा 🙏

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जय मां सुरकंडा 🙏

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जय मां सुरकंडा 🙏

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जय माता दी 🙏

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जय मां सुरकंडा 🙏

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