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दिल्ली की मशहूर दौलत की चाट जो सिर्फ सर्दियों के मौसम में ही बनाई जाती है।
इसी को बनारस में मलइयो और लखनऊ में निमिष या मख्खन कहते हैं।
बनारसी मलइयो: ओस की बूंद से बनती है यह मिठाई, सिर्फ तीन महीने इसे चखने का मौका।
बनारसी जब अपनी तरंग में होते हैं, तो किसी की नहीं सुनते और उनकी सुनें, तो मलइयो नामक दुर्लभ रत्न आपको बनारस के अलावा कहीं नहीं मिल सकता, यहीं जन्म हुआ मलइयो का जो लखनऊ जाकर निमिष और दिल्ली में दौलत की चाट के नाम से मशहूर हुई शायद दिल्ली में सबसे पहले किसी दौलत नामक हलवाई ने बनाई।
हल्की मिठास लिए केसरिया दूध का झाग ‘पानी केरा बुदबुदा’ (पानी के बुलबुले) की याद दिलाता है, मुंह में रखते ही यह हवा में बिला जाता है और बची रह जाती है मनमोहक सुगंध व शायद कुछ हवाइयां पिस्ते की,
‘दूधनी पफ’ भी कहते हैं।
इसे हम जन्म से न सही, मन से बनारसी हैं, मनमौजी हैं, अपनी ही धुन में मगन रहने वाले, मगर हकीकत यह है कि यही अनमोल मौसमी रत्न कई दूसरे शहरों में गुजरे जमाने में लोकप्रिय रहा है, लखनऊ की निमिष, कानपुर की मक्खन तथा दिल्ली की दौलत की चाट मलइयो नहीं तो और क्या है? इतना ही नहीं, पारसी खानपान में इसी चीज को ‘दूधनी पफ’ के नाम से पहचाना जाता है, हमें लखनऊ वाला नाम सबसे माकूल लगता है। निमिष यानी पलक झपकने भर का समय, ज्योतिष गणित की शब्दावली में एक क्षण का आठवां हिस्सा अर्थात् इतनी ही मोहलत मिलती है आपको इस नायाब मिठास का लुत्फ लेने के लिए,
बेहद गुणकारी है मलइयो
ओस की बूदों में तैयार होने वाली मलइयो आयुर्वेदिक दृष्टि से बहुत ही गुणकारी होती है, ओस की बूंदों में प्राकृतिक मिनरल्स पाए जाते हैं, जो त्वचा को लाभ पहुंचाते हैं।
मलइयो में इस्तेमाल केसर, बादाम शक्तिवर्द्धक होते हैं, ये शारीरिक ताकत को बढ़ाते हैं, केसर सुंदरता प्रदान करता है, इसके अलावा यह मिठाई नेत्र ज्योति के लिए भी वरदान मानी जाती है।
कहते हैं जितनी ज्यादा इस पर ओस पड़ती है, उतनी ही इसकी गुणवत्ता बढ़ती जाती है।
जब ओस की तासीर से जगता है ठंडे दूध का जादू आधी सदी पहले मिट्टी के कुल्हड़ में क्रमश: झाग जमाकर ग्राहक के सामने पेश किया जाता था, जाड़े की ओस की तासीर से ठंडे दूध का जादू जगता था, बेचने वाले के किस्से कम लच्छेदार नहीं होते थे, हां, यह बात कबूल करनी ही पड़ेगी कि अवधी नवाबों की नजाकत नफासत ने भले ही निमिष को मलइयो से पहले और ज्यादा लोकप्रियता दिला दी हो, मगर मलाई की कारीगरी बनारसियों ने ही लखनऊ को सिखलाई, मलइयो को बनाने का तरीका अन्य मिठाइयों से काफी अलग है।
मलाई दूध-दही के ऊपर जितना जी चाहे इतरा ले, स्थूल भौतिक जगत का सुख है, यह पहेली सुलझाना कठिन नहीं कि कैसे यह पारसियों के हाथ लगी, अनेक पारसी डॉक्टर, वकील आदि तटवर्ती भारत से दूर मर्मस्थल तक पहुंच गए थे अंग्रेजी हुकूमत के विस्तार के साथ, अवध से ही वह यह सौगात अपने साथ ले गए, ऐसा सुझाना तर्कसंगत है, हां, यह सोचने लायक है कि क्यों ब्रजभूमि में दूध, दही और मक्खन की भूमि में यह अदृश्य है, हालांकि, आजकल शादी-ब्याह की दावतों में हर मौसम में 'दौलत की चाट' का खोमचा चटोरों की खिदमत के लिए खड़ा नजर आता है।
मॉलीक्यूलर’ रसोई के दौर में यंत्रों की मदद से सर्द झाग पैदा करना कठिन काम नहीं है, मगर आप ही बताइए हाथ से बुनी ढाके की मलमल का कोई मुकाबला मशीन पर बने कपड़े से हो सकता है? वही फर्क है, जो देसी कुल्फी और आइसक्रीम में है।

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दिल्ली की मशहूर दौलत की चाट जो सिर्फ सर्दियों के मौसम में ही बनाई जाती है।
इसी को बनारस में मलइयो और लखनऊ में निमिष या मख्खन कहते हैं।
बनारसी मलइयो: ओस की बूंद से बनती है यह मिठाई, सिर्फ तीन महीने इसे चखने का मौका।
बनारसी जब अपनी तरंग में होते हैं, तो किसी की नहीं सुनते और उनकी सुनें, तो मलइयो नामक दुर्लभ रत्न आपको बनारस के अलावा कहीं नहीं मिल सकता, यहीं जन्म हुआ मलइयो का जो लखनऊ जाकर निमिष और दिल्ली में दौलत की चाट के नाम से मशहूर हुई शायद दिल्ली में सबसे पहले किसी दौलत नामक हलवाई ने बनाई।
हल्की मिठास लिए केसरिया दूध का झाग ‘पानी केरा बुदबुदा’ (पानी के बुलबुले) की याद दिलाता है, मुंह में रखते ही यह हवा में बिला जाता है और बची रह जाती है मनमोहक सुगंध व शायद कुछ हवाइयां पिस्ते की,
‘दूधनी पफ’ भी कहते हैं।
इसे हम जन्म से न सही, मन से बनारसी हैं, मनमौजी हैं, अपनी ही धुन में मगन रहने वाले, मगर हकीकत यह है कि यही अनमोल मौसमी रत्न कई दूसरे शहरों में गुजरे जमाने में लोकप्रिय रहा है, लखनऊ की निमिष, कानपुर की मक्खन तथा दिल्ली की दौलत की चाट मलइयो नहीं तो और क्या है? इतना ही नहीं, पारसी खानपान में इसी चीज को ‘दूधनी पफ’ के नाम से पहचाना जाता है, हमें लखनऊ वाला नाम सबसे माकूल लगता है। निमिष यानी पलक झपकने भर का समय, ज्योतिष गणित की शब्दावली में एक क्षण का आठवां हिस्सा अर्थात् इतनी ही मोहलत मिलती है आपको इस नायाब मिठास का लुत्फ लेने के लिए,
बेहद गुणकारी है मलइयो
ओस की बूदों में तैयार होने वाली मलइयो आयुर्वेदिक दृष्टि से बहुत ही गुणकारी होती है, ओस की बूंदों में प्राकृतिक मिनरल्स पाए जाते हैं, जो त्वचा को लाभ पहुंचाते हैं।
मलइयो में इस्तेमाल केसर, बादाम शक्तिवर्द्धक होते हैं, ये शारीरिक ताकत को बढ़ाते हैं, केसर सुंदरता प्रदान करता है, इसके अलावा यह मिठाई नेत्र ज्योति के लिए भी वरदान मानी जाती है।
कहते हैं जितनी ज्यादा इस पर ओस पड़ती है, उतनी ही इसकी गुणवत्ता बढ़ती जाती है।
जब ओस की तासीर से जगता है ठंडे दूध का जादू आधी सदी पहले मिट्टी के कुल्हड़ में क्रमश: झाग जमाकर ग्राहक के सामने पेश किया जाता था, जाड़े की ओस की तासीर से ठंडे दूध का जादू जगता था, बेचने वाले के किस्से कम लच्छेदार नहीं होते थे, हां, यह बात कबूल करनी ही पड़ेगी कि अवधी नवाबों की नजाकत नफासत ने भले ही निमिष को मलइयो से पहले और ज्यादा लोकप्रियता दिला दी हो, मगर मलाई की कारीगरी बनारसियों ने ही लखनऊ को सिखलाई, मलइयो को बनाने का तरीका अन्य मिठाइयों से काफी अलग है।
मलाई दूध-दही के ऊपर जितना जी चाहे इतरा ले, स्थूल भौतिक जगत का सुख है, यह पहेली सुलझाना कठिन नहीं कि कैसे यह पारसियों के हाथ लगी, अनेक पारसी डॉक्टर, वकील आदि तटवर्ती भारत से दूर मर्मस्थल तक पहुंच गए थे अंग्रेजी हुकूमत के विस्तार के साथ, अवध से ही वह यह सौगात अपने साथ ले गए, ऐसा सुझाना तर्कसंगत है, हां, यह सोचने लायक है कि क्यों ब्रजभूमि में दूध, दही और मक्खन की भूमि में यह अदृश्य है, हालांकि, आजकल शादी-ब्याह की दावतों में हर मौसम में 'दौलत की चाट' का खोमचा चटोरों की खिदमत के लिए खड़ा नजर आता है।
मॉलीक्यूलर’ रसोई के दौर में यंत्रों की मदद से सर्द झाग पैदा करना कठिन काम नहीं है, मगर आप ही बताइए हाथ से बुनी ढाके की मलमल का कोई मुकाबला मशीन पर बने कपड़े से हो सकता है? वही फर्क है, जो देसी कुल्फी और आइसक्रीम में है।

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काशी 🔱

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किसको याद है ✌️

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विदेशों में मंहगाई चरम सीमा पर फिर भी भारत में मंहगाई काबू में है।।🤭🫢🤗

भारत में लोग कहते हैं कि बहुत मंहगाई है यंहा देखिए मांस कौडियों के भाव और सब्जियां सोने के भाव।

टिंडे जैसी सब्जी लगभग 600 रुपये 🙄

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❤️💯❣️🔥
अफगानिस्तान😍😍
1972 के काबुल शहर में तीन छात्राएं टहलती हुए 🥰
क्या वो भी समय थे🔥✊

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दुर्लभ तस्वीर साबरमती के संत🤗

गुजरात में सबसे पहला
टेलीफोन अंग्रेजों ने लाखों
रुपए खर्च कर तथा विशेष
लाइन बिछाकर तथाकथित
सेकुलर गांधीजी के लिए
साबरमती आश्रम
में लगवाया था।

जरुरत यह महसूस की गई
थी कि कभी भी #गुप्त_मंत्रणा
करनी हो तो बिना देरी के किया
जा सके।😢

और आज के तथाकथित
गांधीवादियों के नजरों में
अंग्रेजों के गुलाम
वीर सावरकर हो गये ?😊
जय हिंद जय भारत

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💞💕विश्व टेलीविजन दिवस विशेष:🥰🥰🔥💯✊

#भारत में टेलीविजन की आहट वैसे तो 1950 में ही हो गई थी जब #चेन्नई के इलेक्ट्रिकल #इंजीनियरिंग के स्टूडेंट ने कैथोड रेज टेलीविजन सेट डिस्प्ले के लिए रखा था मगर #घरों में इसकी पहुंच 1959 में पहले ट्रांसमिशन के बाद ही हो पाई।

1965 में डेली ट्रांसमिशन चालू हुआ और #दिल्ली के अलावा #मुम्बई और #अमृतसर से भी #प्रसारण होने लगा।

अस्सी के दशक में टीवी #धारावाहिक बनने शुरू हुए और अभिजात्य घरों से निकलकर टीवी अब कस्बों और गांव की ओर बढ़ चला।

#गांव गली में टेलीविजन सेट्स पहुंचने का श्रेय श्री #रामानन्द सागर जी को जाता है जिन्होंने #प्रभु श्री #राम की कथा को एक मनमोहक अंदाज में जन जन तक पहुंचाया। #रामायण धारावाहिक के प्रसारण के समय सड़कों पर अघोषित कर्फ्यू लग जाता था।

मुझे खूब याद है कि गॉंवों में रामायण का एपिसोड शुरू होने से पहले बिजली आपूर्ति बाधित होने की दशा में टीवी सेट चालू रखने के लिए लैड एसिड बैटरियों का इंतजाम किया जाता था या फिर ट्रैक्टर से बिजली पैदा करके धारावाहिक देखा जाता था। धारावाहिक शुरू होने से पहले टीवी सेट के सामने #अगरबत्ती जलाई जाती थी और खत्म होने के बाद देखने आए #मुहल्ले भर के दर्शक गणों को प्रसाद वितरित किया जाता था।

और #कलाकारों का सम्मान तो बस पूछिये मत। साक्षात भगवान श्री राम और माता सीता की तरह पूजा जाता था उनको।

इसी के बाद आरम्भ हुए #महाभारत ने भी लोगों को अपनी ओर आकृष्ट किया। हम लोग, बुनियाद, वागले की दुनिया, माल गुड़ी डेज... ता ना ना ता ना ना, जंगल बुक... चढ्ढी पहन के फूल खिला है, रात को सोना है तो जाग जाइए...

पहले जमाने में टीवी मोटे हुआ करते थे CRT के कारण और बीबियाँ पतली। विकास की आंधी ने टीवी पतले कर दिए और बीबियाँ मोटी...

फोटो में है: RCA-630 TS बोले तो सभी मॉडर्न टेलीविजन सेट्स के पड़दादा का पड़दादा...

#विश्व_टेलीविजन_दिवस
#repost कॉपी copy

जय हिंद 😍

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आधुनिक भारत के राष्ट्रवादी पत्रकार😍😍💯
साधुवाद प्यारी बहना 💯💥

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पिता-पुत्री..🌺🌿🌺

बेटी की विदाई के समय पिता सबसे अंत में रोता है।
अन्य सब भावुकता में रोते है पर पिता उस बेटी के बचपन से विदाई तक के पल याद कर कर के रोता है।
माँ बेटी के सम्बन्धों पर तो बात होती ही है पर पिता और बेटी का सम्बन्ध भी समुद्र से गहरा है।
हर पिता घर के बेटे को डाँट देता है, धमकाता है, पीट भी देता है पर वही पिता अपनी बेटी की हर गलती नकली क्रोध दिखाकर क्षमा कर देता है।
बेटे ने कुछ माँगा तो एक बार डाट देता है पर बेटी ने धीरे से भी कुछ माँगा तो पिता को सुनाई दे जाता है और जेब में पैसे हो न हो बेटी की इच्छा पूरी कर देता है।
दुनिया उस पिता का सबकुछ लूट ले तो भी वो हार नहीं मानता पर जो अपनी बेटी के आँखों के आँसू देख कर खुद अंदर से बिखर जाए उसे पिता कहते है।
और बेटी भी जब घर में रहती है तो उसे हर बात में पिता का घमंड होता है। किसी ने कुछ कहा कि तपाक से बोलती है पापा को आने दे फिर बताती हूँ।
बेटी घर में रहती तो माँ के आँचल में है पर बेटी की हिम्मत उसका पिता रहता है।
बेटी की जब शादी में विदाई होती है तब वो सबसे मिलकर रोती तो है पर जैसे ही विदाई के समय कुर्सी समेटते पिता को देखती है, जाकर झूम जाती है, लिपट जाती है, ऐसा कस के पकड़ती है पिता को जैसे माँ अपने बेटे को।
क्योंकि उस बच्ची को पता है ये पिता ही है जिसके दम पर मैंने हर जिद पूरी की थी।
पिता स्वयं रोता भी है और बेटी की पीठ ठोक कर फिर हिम्मत देता है कि बेटा चार दिन बाद आ जाऊँगा लेने।
और खुद जानबूझकर निकल जाता है किसी कोने में और उस कोने में जाकर कितना फुट फुट रोता है वो पिता, ये बात सिर्फ बेटी का पिता ही समझ सकता है।
जब तक पिता जिंदा रहता है बेटी मायके में हक़ से आती है और घर में भी जिद कर लेती है और कोई कुछ कहे तो डट के बोल देती है कि मेरे बाप का घर है।
पर जैसे ही पिता की मृत्यु होती है और बेटी आती है वो इतनी चित्कार कर रोती है कि सारे रिश्तेदार समझ जाते है कि बेटी आ गई है।
वो बेटी उस दिन हिम्मत हार जाती है क्योंकि उस दिन उसका पिता नहीं हिम्मत मर जाता है।
पिता की मौत के बाद बेटी कभी अपने भाई के घर जिद नहीं करती जो मिला खा लिया जो दिया पहन लिया।
क्योंकि उसका पिता था तब तक सब कुछ उसका था वो जानती है।
आगे लिखने की हिम्मत नहीं है बस इतना कहता हूँ बाप के लिए बेटी उसकी जिंदगी होती है पर वो कभी बोलता नहीं।
और बेटी के लिए पिता दुनिया की सबसे बड़ी हिम्मत और घमंड होता है पर बेटी भी कभी बोलती नहीं।
पिता और पुत्री का प्रेम समुद्र से भी गहरा है....🌺
रिपोस्ट कॉपी साभार 👏

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