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दुनिया के किसी भी होटल में हमने किसी औरत को खाना बनाते नहीं देखा है। संसार का कोई भी बड़ा शेफ सामान्यत : औरत नहीं है। बच्चों की देखभाल के छोटे छोटे सेंटर जगह जगह खुल ही रहे हैं।
बहुत से पुरुष विभिन्न अवसरों पर औरतों या लड़कियों को मेंहदी लगा रहे हैं। ऐसे ढेर सारे काम हैं जो घरों में औरतें करती आ रही हैं। पर जैसे ही उस काम से पैसे मिलने शुरू होते हैं तो औरत पीछे छूट जाती है।
अर्थात जब कभी सदियों से किसी औरत के द्वारा किए जाने वाले काम के साथ अर्थ ( पैसा ) जुड़ता है तो आदमी औरत को रिप्लेस कर देता है। भारत में भी 1961 तक औरतों द्वारा घर में किए गए काम को देश की GDP में गिना जाता था।
सच तो यह है कि औरतों द्वारा किया जाने वाला घर का काम किसी ऑफिस की जॉब से ज्यादा कठिन होता है। किसी बिजनेसमैन की तरह ही व्यस्तता होती है। साल के 365 दिनों में से किसी भी दिन छुट्टी नहीं।