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1962 की जंग में दुनिया के सबसे दुर्गम रणक्षेत्र
रेजांगला में 1400 चीनी सैनिकों को मौत के घाट
उतारने वाले,
और अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए जीवन का
सर्वोच्च बलिदान देने वाले भारत के महान सपूत
114 वीर अहीरों की शहादत को नमन,

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18 नवम्बर 1962भारत-चीन युद्ध में रेज़ांगला में शहीद हुए 114 वीर अहीर सैनिकों को श्रद्धाजंलि।"चीन युद्ध" "परमवीर चक्र"
#अहीर_शौर्य_दिवस

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करीना खान का बेटा तैमूर होता तो लाखो लाइक मिल जाते आज देश को गोल्ड मैडल देने वाली गीता फोगट के बेटे के लिए लाइक नहीं करोगे 💖

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* कैकेयी मंथरा संवाद
* सादर पुनि पुनि पूँछति ओही।
* सबरी गान मृगी जनु मोही॥
तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी।
रहसी चेरि घात जनु फाबी॥
भावार्थ:-बार-बार रानी उससे आदर के साथ पूछ रही है, मानो भीलनी के गान से हिरनी मोहित हो गई हो। जैसी भावी (होनहार) है, वैसी ही बुद्धि भी फिर गई। दासी अपना दाँव लगा जानकर हर्षित हुई॥
* तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराउँ।
* धरेहु मोर घरफोरी नाऊँ॥
सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली।
अवध साढ़साती तब बोली॥
भावार्थ:-तुम पूछती हो, किन्तु मैं कहते डरती हूँ, क्योंकि तुमने पहले ही मेरा नाम घरफोड़ी रख दिया है। बहुत तरह से गढ़-छोलकर, खूब विश्वास जमाकर, तब वह अयोध्या की साढ़ साती (शनि की साढ़े साती वर्ष की दशा रूपी मंथरा) बोली-॥
जय श्री राम

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* कैकेयी मंथरा संवाद
* सादर पुनि पुनि पूँछति ओही।
* सबरी गान मृगी जनु मोही॥
तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी।
रहसी चेरि घात जनु फाबी॥
भावार्थ:-बार-बार रानी उससे आदर के साथ पूछ रही है, मानो भीलनी के गान से हिरनी मोहित हो गई हो। जैसी भावी (होनहार) है, वैसी ही बुद्धि भी फिर गई। दासी अपना दाँव लगा जानकर हर्षित हुई॥
* तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराउँ।
* धरेहु मोर घरफोरी नाऊँ॥
सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली।
अवध साढ़साती तब बोली॥
भावार्थ:-तुम पूछती हो, किन्तु मैं कहते डरती हूँ, क्योंकि तुमने पहले ही मेरा नाम घरफोड़ी रख दिया है। बहुत तरह से गढ़-छोलकर, खूब विश्वास जमाकर, तब वह अयोध्या की साढ़ साती (शनि की साढ़े साती वर्ष की दशा रूपी मंथरा) बोली-॥
जय श्री राम

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* कैकेयी मंथरा संवाद
* सादर पुनि पुनि पूँछति ओही।
* सबरी गान मृगी जनु मोही॥
तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी।
रहसी चेरि घात जनु फाबी॥
भावार्थ:-बार-बार रानी उससे आदर के साथ पूछ रही है, मानो भीलनी के गान से हिरनी मोहित हो गई हो। जैसी भावी (होनहार) है, वैसी ही बुद्धि भी फिर गई। दासी अपना दाँव लगा जानकर हर्षित हुई॥
* तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराउँ।
* धरेहु मोर घरफोरी नाऊँ॥
सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली।
अवध साढ़साती तब बोली॥
भावार्थ:-तुम पूछती हो, किन्तु मैं कहते डरती हूँ, क्योंकि तुमने पहले ही मेरा नाम घरफोड़ी रख दिया है। बहुत तरह से गढ़-छोलकर, खूब विश्वास जमाकर, तब वह अयोध्या की साढ़ साती (शनि की साढ़े साती वर्ष की दशा रूपी मंथरा) बोली-॥
जय श्री राम

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