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🙏🙏जय सियाराम जी🙏🙏
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तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें।
करौं काह असमंजस जीकें॥
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राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी।
तनु परिहरेउ पेम पन लागी॥
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भावार्थ:-श्रीराम जी कहते हैं कि हे तात(भरतजी) ! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। क्या करूँ? जी में बड़ा असमंजस (दुविधा) है। राजा ने मुझे त्याग कर सत्य को रखा और प्रेम-प्रण के लिए शरीर छोड़ दिया।
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तासु बचन मेटत मन सोचू।
तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू॥
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ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा।
अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा॥
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भावार्थ:-उनके वचन को मेटते मन में सोच होता है। उससे भी बढ़कर तुम्हारा संकोच है। उस पर भी गुरुजी ने मुझे आज्ञा दी है, इसलिए अब तुम जो कुछ कहो, अवश्य ही मैं वही करना चाहता हूँ।
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मनु प्रसन्न करि सकुच तजि
कहहु करौं सोइ आजु।
सत्यसंध रघुबर बचन
सुनि भा सुखी समाजु॥
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भावार्थ:-तुम मन को प्रसन्न कर और संकोच को त्याग कर जो कुछ कहो, मैं आज वही करूँ। सत्य प्रतिज्ञ रघुकुल श्रेष्ठ श्री रामजी का यह वचन सुनकर सारा समाज सुखी हो गया।
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वंदउ राम लखन वैदेही।
जे तुलसी के परम् सनेही॥
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अनुज जानकी सहित निरंतर।
बसउ राम नृप मम् उर अंतर॥
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🙏🙏जय सियाराम जी🙏🙏