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मंटो
दो दिन पहले #मंटो देखी। पहले क्यों नहीं देखी या देखने में 4-5 साल क्यों लग गए इसका जवाब यही कि मैं इसे लेकर आश्वस्त नहीं थी कि कोई मंटो को एक फ्रेम में भला कैसे बांध सकता है। फ़िल्म देखकर लगा मेरी ये आशंका आधारहीन नहीं थी। नन्दिता दास ने मेहनत की है पर मंटो के किरदार को फ़िल्म में समेटते हुए उनकी मशहूर कहानियों के फिल्मांकन का मोह नहीं छोड़ पायीं वे। यकीनन ये फिल्मांकन उन्हें बेहतरीन निर्देशक साबित करते हैं पर अगर हम फ़िल्म 'मंटो' की बात करें जिसका किरदार है एक असाधारण रूप से जहीन लेखक सआदत हसन मंटो तो यहाँ वे चूक जाती हैं। फ़िल्म में मंटो की कहानियों के किरदार जब उनकी बॉयोपिक में अनायास ही घूमते दिखते हैं तो वे तारतम्य को तोड़ देते हैं। आप फ़िल्म देखते हुए किसी डॉक्यूमेंट्री को देखने के अहसास से भर जाते हैं।
नवाज़ुद्दीन सिद्दकी ने मंटो के किरदार को बखूबी निभाया। मंटो की उलझी हुई शख़्सियत की बेचैनी का कुछ अंश उनके अभिनय में यकीनन दिखाई पड़ा लेकिन मंटो की पत्नी के रूप में सफ़िया भी ध्यान खींचती हैं। एक ऐसे मुश्किल व्यक्ति के साथ रहना जिसके साथ रहना आसानियों में शामिल नहीं, रसिका दुग्गल को देखकर बारहा लगता रहा कि सफ़िया ऐसी ही होंगी।
इस्मत आपा के रोल में राजश्री देशपांडे भी खूब जमी हैं। सबसे ज्यादा मैं जिस किरदार को देखने की उत्सुकता से भर उठी थी वह था गुज़रे जमाने के अभिनेता श्याम कुमार उर्फ़ सुंदर श्याम चड्ढा का किरदार। इनके बारे में ये जानकारी तो बचपन से थी कि श्याम महज 31 साल की उम्र में शबिस्तान फ़िल्म की शूटिंग के दौरान घोड़े से गिरकर मर गए थे। ये जानकारी एक जहीन वरिष्ठ मित्र से बाद में मिली कि उनके और मंटो के बीच दोस्ती का बहुत प्यारा रिश्ता था। मुझे श्याम के किरदार में ताहिर राज भसीन की एक्टिंग तो खूब पसंद आयी पर श्याम की लहीम शहीम कदकाठी और उनके शानदार व्यक्तित्व के आगे भसीन 19 ही रहे। मंटो के साथ उनकी केमिस्ट्री जरूर देखने को मिली। लड़कियों के ऑडिशन के बहाने उनका शोषण करने वाले प्रोड्यूसर के रोल में ऋषि कपूर, नरगिस की माँ जद्दनबाई के रोल में इला अरुण, नरगिस के रोल में फरयाना वज़ीर, अशोक कुमार के रोल में भानु उदय भी बढ़िया लगे।
फ़िल्म की यूसपी है मंटो के वन लाइनर। मंटो के बारे में प्रचलित लगभग सभी बातों और उनके बयानों को समेटने की अच्छी कोशिश है बाकी मंटो की शख़्सियत अपने आप मे इतनी उलझी हुई है कि ये कोशिश कई बार नाकाफ़ी महसूस हुई। प्रोग्रेसिव राइटर असोसिएशन के साथ उनके रिश्ते, उनके आसपास का वह अजीब माहौल जो उनकी कहानियों की विषयवस्तु बनता है, फिल्मी दुनिया में फिट न हो पाने की जद्दोजहद, राजनीति और बंटवारे के बाद का वातावरण, मंटो पर अश्लीलता के आरोप और मुकदमे, मंटो की शराबनोशी और उनका मानसिक विचलन थोड़ा थोड़ा सब शामिल है, पूरा देखने की प्यास जगाता हुआ। काश इसे एक वेब सीरीज के रूप में बनाया गया होता तो मंटो, पार्टीशन और उस दौर के सिनेमा, साहित्य, समाज से जुड़े कई पहलुओं को विस्तार से शामिल किया जा सकता था।
अब कहानियों की बात करें तो मंटो की दिल दहला देने वाली लगभग 5-6 कहानियों को शामिल किया गया है, जिनमें 'खोल दो', 'ठंडा गोश्त', टोबा टेक सिंह, और तवायफों के जीवन पर आधारित दो कहानियाँ 'दस रुपए का नोट' और 'सौ कैंडिल पॉवर का बल्ब' फिल्माई गईं हैं। गुरदास मान, दिव्या दत्ता, रणवीर शौरी, तिलोत्तमा शोम, परेश रावल, विनोद नागपाल आदि ने इन छोटे टुकड़ों में मंटो के किरदारों को जीवंत कर दिया जबकि इन कहानियों से मुख्य किरदार मंटो और उसकी कहानी का प्रभाव कुछ कम होता या टूटता प्रतीत होता है। यदि आप साहित्य से जुड़े हैं और मंटो को पढ़ा है तो कहानी पहचान लेंगे लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो आपको फ़िल्म देखते हुए थोड़ी उलझन जरूर मालूम होगी।
एक सीन है जहाँ मंटो को गाँधीजी की हत्या की सूचना मिलती है। वह सीन इतना मार्मिक है कि मैं उस सीन के लिये इसे दोबारा देखूँगी। आप मंटो के चाहनेवाले हैं तो जियो सिनेमा या यूट्यूब पर एक बार जरूर देखिये।
बीते दिनों बाल कलाकार अनिल कपूर की ओटीटी डेब्यू ‘एके वर्सेज एके’ देखी। इसे पूरी तरह ओरिजनल रखने की कोशिश की है। सभी किरदार रियल लिखे गये है।
अनिल का एटीट्यूड भी दिखलाया है।
फिल्म में अनिल डायलॉग बोलते है, ‘1986 में 13 हिट लाइन से दी थी’
संवाद सुनकर संदेह हुआ और साथ ही भारतीय इतिहास भी अचंभे में पड़ गया कि ये कब हुआ? और हुआ तो मैं क्या कर रहा था?
फिर अनिल कपूर की फिल्मी कुंडली खंगाली गई और देखा कि कुल जमा हिट फिल्म 20 है। तिस पर सोलो में 6-7 है तो वही कुछ मल्टीस्टारर रही, बाकी बची फिल्में सपोर्टिंग किरदारों में हिट हुई।
लाइन से हिट तो काका दिये है।
फ्लॉप में कई हीरो सूचीबद्ध है।
अनिल कपूर अपने समकालीन सनी देओल को हीरो नहीं समझते थे। स्वयं को बड़ा स्टार मानते आए हैं। नो डाउट अभिनेता अच्छे है। आज के लौंडों की तुलना में खुद को इक्कीस बना रखा है।
इसी के चलते 2004 के बाद हॉलीवुड की गलियों में भटके ताकि अंतर्राष्ट्रीय स्टार बन सके। लेकिन टॉम क्रूज की घोस्ट ने स्वप्न छिन्न-भिन्न कर दिया।
एके फिल्म में अनुराग कश्यप की ऑल्विन कालीचरण का जिक्र है बल्कि फिल्म का प्लॉट ही इसके इर्दगिर्द लिखा गया है। दरअसल, अनुराग की ऐसी स्क्रिप्ट बॉम्बे वेलवेट थी। जिसे रणबीर के साथ बना दिया था, फिल्म का हश्र किसी से छिपा नहीं है।
ऑल्विन को लेकर अनुराग कई हीरो के पास गये और आखिरी बातचीत शाहरुख ख़ान के साथ थी लेकिन बात बन न सकी। ये फिल्म जब भी बनेगी न, डिज़ास्टर होगी। क्योंकि ऐसे प्लॉट लंबे समय तक बस्ते में पड़े रहते है तो निपट जाते है इसका प्लॉट ही 2025 पर केंद्रित था। जहां इकॉनमी ध्वस्त की बात थी लेकिन अभी भारत 5 ट्रिलियन की बात कर रहा है खैर
स्वर्ण मंदिर, अमृतसर 🇮🇳
क्या अद्भुत जगह है! सबसे पवित्र गुरुद्वारा और सिखियों का सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल। मंदिर एक लंगर, या सामुदायिक रसोई चलाता है, जो धर्म, जाति, या पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना सभी आगंतुकों को मुफ्त भोजन परोसता है। यह दुनिया की सबसे बड़ी फ्री रसोई माना जाता है, रोजाना हजारों भोजन परोसता है।
भारत में एक सचमुच भारी अनुभव!
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