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अमर सिंह चमकीला फिल्म देख कर एक बात तो समझ आई कि जात अहंकारी लोग चढ़ाई बर्दास्त नही कर पाये एक
च मार की
ऐसा इसलिए लिख रहा हूँ क्योकि उस समय के गायक चमकीला की तर्ज पर ही गीत गाते थे लेकिन ये गीत न गाने का दबाव केवल और केवल चमकीला पर बनाया गया।
उस समय का सबसे महंगा और लोकप्रिय गायक था जिसकी टेप ब्लेक मे बिकती थी।
लोगो की डिमांड पर वो गीत गाता था जिस कारण और गायक घर बैठ गये।
मीडिया ने चमकीले की छवि को खराब करने मे पुरा सहयोग किया।
समय के अनुसार वो गीत गाने भी बंद कर दिये थे जिन पर लोग इतराज करते थे लेकिन अखाड़े मे लोगो की डिमांड पर वो गीत गाने पड़े चमकीले को जिस कारण विरोधी चीड़ गये।
एक समय था जब चमकीला डरा हुआ था इन लोगो से लेकिन डर इतना बढ़ गया कि फिर उसे मरने के डर को ही मार दिया और अपनी पत्नी को कहाँ गाना छोड़ दिया तो जीते जी मर जाएगे।
किसने गोली भी मार दी तो मर कर भी जिंदा रहेंगे।
अंत मे हुआ भी वही दोनो की हत्या हुई कोई गिरफ्तारी नही हुई।
लेकिन चमकीले की आवाज कभी मरी नही आज भी कितने गायक उनके गीत गा कर स्टार बने हुए है।
चमकीला आज भी जिंदा है और दहाड रहा है।
‘चमार हूँ, पर भूखा नहीं मरूँगा!’
यह एक डायलॉग ‘अमर सिंह चमकीला’ फ़िल्म में जब आता है तो एक क़ाबिल कलाकार धनी राम के टीस का मर्म और उसकी ज़िद की गहराई और भीतर से समझ आती है।
इस बार इम्तियाज़ अली का यह निर्देशन दुनिया के उन सभी कलाकारों के पक्ष में जिन्हें शील-अश्लील केटेगरी में बाँटा जाता है।कला, शील-अश्लील नहीं होती, सोच होती है। ‘अमर सिंह चमकीला’ फ़िल्म समाज की हिपोक्रेसी का सटीक उदाहरण है।
इसमें वह सारे संघर्ष दिखाए गए हैं जो एक कलाकार के जीवन में होना स्वाभाविक हैं सिर्फ़ इसलिए क्योंकि हमारा समाज सेंसेटाइज़ नहीं है।
“ये बंदूक वालों का तो काम है गोली चलाना, तो ये चलाएंगे।हम गाने बजाने वाले हैं, हमारा काम है गीत गाना तो हम गाएंगे न वो हमारे लिए रुकेंगे न हम उनके लिए। जब तक हम हैं, तब तक स्टेज पर हैं और जीते जी मर जाएं, इससे तो अच्छा है मर के जिंदा रहें।”
यह डायलॉग एक कलाकार होने की आत्मा को बाहर निकाल कर रखने जैसा है।
दिलजीत दोसांझ के अभिनय को देखकर, उन्हें पीरियड फ़िल्म में जल्द देखने की इच्छा हो रही है। हमने चमकीला को नहीं देखा, पर हम दलजीत में चमकीला को देख पाए, बखूबी! परी ने बब्बी की एक-एक डिटेलिंग पर काम किया है। परी की एण्ट्री उनके हाथ में एक किताब से होती है जिसका नाम होता है, ‘चिट्टा लहू’।
यह सीन अपने आप में एक बड़ा बिम्ब स्थापित करती है।यह उपन्यास पंजाब के प्रख्यात लेखक नानक सिंह ने सन् 1932 में लिखा था।
यह किताब समाज के भीतर के रूढ़िवादी प्रैक्टिस पर व्यंग्य करती है।
थोड़ी और जानकारी खंगालने पर उपन्यास का एक अंश भी मिल गया,
"ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे समाज की जीवनधारा में लाल कण गायब हो गए हैं।"
‘तुम सभी साफ़ सही, हूँ मटमैला मैं’, इरशाद कामिल का यह गीत पूरे एल्बम का पसन्दीदा गीत है।
बाक़ी रात के हर सीन में थोड़ी मोमबत्तियाँ और लालटेन की अधिकता खटकती है।
बहरहाल फ़िल्म जैसे थिएटर देख रहे हों।इतनी जीवन्तता! पंजाब का तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य साथ-साथ चलता है, इसलिए फ़िल्म और वास्तविक लगती है। हालाँकि जलते हुए पंजाब का दृश्य बार-बार। बेतरतीब तरीक़े से आता है वह खटकता है। जो बात एक-दो बार में संप्रेषित हो चुकी होती है।उसका दोहराव लगता है।
इस फ़िल्म का संगीत, कुछ दिन ट्रैक पर रहेगा। अरिजीत के दौर में मैं मोहित चौहान की आवाज़ के जादू 💛 पर ही अटकी हुई हूँ तो क्या कीज़े!
‘चमार हूँ, पर भूखा नहीं मरूँगा!’
यह एक डायलॉग ‘अमर सिंह चमकीला’ फ़िल्म में जब आता है तो एक क़ाबिल कलाकार धनी राम के टीस का मर्म और उसकी ज़िद की गहराई और भीतर से समझ आती है।
इस बार इम्तियाज़ अली का यह निर्देशन दुनिया के उन सभी कलाकारों के पक्ष में जिन्हें शील-अश्लील केटेगरी में बाँटा जाता है।कला, शील-अश्लील नहीं होती, सोच होती है। ‘अमर सिंह चमकीला’ फ़िल्म समाज की हिपोक्रेसी का सटीक उदाहरण है।
इसमें वह सारे संघर्ष दिखाए गए हैं जो एक कलाकार के जीवन में होना स्वाभाविक हैं सिर्फ़ इसलिए क्योंकि हमारा समाज सेंसेटाइज़ नहीं है।
“ये बंदूक वालों का तो काम है गोली चलाना, तो ये चलाएंगे।हम गाने बजाने वाले हैं, हमारा काम है गीत गाना तो हम गाएंगे न वो हमारे लिए रुकेंगे न हम उनके लिए। जब तक हम हैं, तब तक स्टेज पर हैं और जीते जी मर जाएं, इससे तो अच्छा है मर के जिंदा रहें।”
यह डायलॉग एक कलाकार होने की आत्मा को बाहर निकाल कर रखने जैसा है।
दिलजीत दोसांझ के अभिनय को देखकर, उन्हें पीरियड फ़िल्म में जल्द देखने की इच्छा हो रही है। हमने चमकीला को नहीं देखा, पर हम दलजीत में चमकीला को देख पाए, बखूबी! परी ने बब्बी की एक-एक डिटेलिंग पर काम किया है। परी की एण्ट्री उनके हाथ में एक किताब से होती है जिसका नाम होता है, ‘चिट्टा लहू’।
यह सीन अपने आप में एक बड़ा बिम्ब स्थापित करती है।यह उपन्यास पंजाब के प्रख्यात लेखक नानक सिंह ने सन् 1932 में लिखा था।
यह किताब समाज के भीतर के रूढ़िवादी प्रैक्टिस पर व्यंग्य करती है।
थोड़ी और जानकारी खंगालने पर उपन्यास का एक अंश भी मिल गया,
"ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे समाज की जीवनधारा में लाल कण गायब हो गए हैं।"
‘तुम सभी साफ़ सही, हूँ मटमैला मैं’, इरशाद कामिल का यह गीत पूरे एल्बम का पसन्दीदा गीत है।
बाक़ी रात के हर सीन में थोड़ी मोमबत्तियाँ और लालटेन की अधिकता खटकती है।
बहरहाल फ़िल्म जैसे थिएटर देख रहे हों।इतनी जीवन्तता! पंजाब का तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य साथ-साथ चलता है, इसलिए फ़िल्म और वास्तविक लगती है। हालाँकि जलते हुए पंजाब का दृश्य बार-बार। बेतरतीब तरीक़े से आता है वह खटकता है। जो बात एक-दो बार में संप्रेषित हो चुकी होती है।उसका दोहराव लगता है।
इस फ़िल्म का संगीत, कुछ दिन ट्रैक पर रहेगा। अरिजीत के दौर में मैं मोहित चौहान की आवाज़ के जादू 💛 पर ही अटकी हुई हूँ तो क्या कीज़े!
‘चमार हूँ, पर भूखा नहीं मरूँगा!’
यह एक डायलॉग ‘अमर सिंह चमकीला’ फ़िल्म में जब आता है तो एक क़ाबिल कलाकार धनी राम के टीस का मर्म और उसकी ज़िद की गहराई और भीतर से समझ आती है।
इस बार इम्तियाज़ अली का यह निर्देशन दुनिया के उन सभी कलाकारों के पक्ष में जिन्हें शील-अश्लील केटेगरी में बाँटा जाता है।कला, शील-अश्लील नहीं होती, सोच होती है। ‘अमर सिंह चमकीला’ फ़िल्म समाज की हिपोक्रेसी का सटीक उदाहरण है।
इसमें वह सारे संघर्ष दिखाए गए हैं जो एक कलाकार के जीवन में होना स्वाभाविक हैं सिर्फ़ इसलिए क्योंकि हमारा समाज सेंसेटाइज़ नहीं है।
“ये बंदूक वालों का तो काम है गोली चलाना, तो ये चलाएंगे।हम गाने बजाने वाले हैं, हमारा काम है गीत गाना तो हम गाएंगे न वो हमारे लिए रुकेंगे न हम उनके लिए। जब तक हम हैं, तब तक स्टेज पर हैं और जीते जी मर जाएं, इससे तो अच्छा है मर के जिंदा रहें।”
यह डायलॉग एक कलाकार होने की आत्मा को बाहर निकाल कर रखने जैसा है।
दिलजीत दोसांझ के अभिनय को देखकर, उन्हें पीरियड फ़िल्म में जल्द देखने की इच्छा हो रही है। हमने चमकीला को नहीं देखा, पर हम दलजीत में चमकीला को देख पाए, बखूबी! परी ने बब्बी की एक-एक डिटेलिंग पर काम किया है। परी की एण्ट्री उनके हाथ में एक किताब से होती है जिसका नाम होता है, ‘चिट्टा लहू’।
यह सीन अपने आप में एक बड़ा बिम्ब स्थापित करती है।यह उपन्यास पंजाब के प्रख्यात लेखक नानक सिंह ने सन् 1932 में लिखा था।
यह किताब समाज के भीतर के रूढ़िवादी प्रैक्टिस पर व्यंग्य करती है।
थोड़ी और जानकारी खंगालने पर उपन्यास का एक अंश भी मिल गया,
"ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे समाज की जीवनधारा में लाल कण गायब हो गए हैं।"
‘तुम सभी साफ़ सही, हूँ मटमैला मैं’, इरशाद कामिल का यह गीत पूरे एल्बम का पसन्दीदा गीत है।
बाक़ी रात के हर सीन में थोड़ी मोमबत्तियाँ और लालटेन की अधिकता खटकती है।
बहरहाल फ़िल्म जैसे थिएटर देख रहे हों।इतनी जीवन्तता! पंजाब का तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य साथ-साथ चलता है, इसलिए फ़िल्म और वास्तविक लगती है। हालाँकि जलते हुए पंजाब का दृश्य बार-बार। बेतरतीब तरीक़े से आता है वह खटकता है। जो बात एक-दो बार में संप्रेषित हो चुकी होती है।उसका दोहराव लगता है।
इस फ़िल्म का संगीत, कुछ दिन ट्रैक पर रहेगा। अरिजीत के दौर में मैं मोहित चौहान की आवाज़ के जादू 💛 पर ही अटकी हुई हूँ तो क्या कीज़े!
