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!! सूरवीर गौ रक्षक वीर श्री पाबूजी
राठौड़ !!
सोढी छोड़ी बिल्खती , माथै सावण मौड़ ।
अमला वैला आपने ,रंग है पाबुजी राठौड़।।
राव सिहाजी "मारवाड में राठौड वंश के संस्थापक " उनके तीन पुत्र थे ।
राव आस्थानजी, राव अजेसीजी, राव सोनगजी !
राव आस्थानजी के आठ पूत्र थे !
राव धुहडजी, राव धांधलजी, राव हरकडजी,राव पोहडजी, राव खिंपसिजी, राव आंचलजी,राव चाचिंगजी, राव जोपसाजी !
राव धांधलजी राठौड़ के दो पुत्र थे ! बुढोजी और पाबुजी !
श्री पाबूजी राठौङ का जन्म 1313 ई में कोळू ग्राम में हुआ था ! कोळू ग्राम जोधपुर में फ़लौदी के पास है ।
धांधलजी कोळू ग्राम के राजा थे, धांधल जी की ख्याति व नेक नामी दूर दूर तक प्रसिद्ध थी ।
एक दिन सुबह सवेरे धांधलजी अपने तालाब पर नहाकर भगवान सूर्य को जल तर्पण कर रहे थे ।
तभी वहां पर एक बहुत ही सुन्दर अप्सरा जमीन पर उतरी ! राजा धांधल जी उसे देख कर उस पर मोहित हो गये, उन्होने अप्सरा के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा ।
जवाब में अप्सरा ने एक वचन मांगा कि राजन ! आप जब भी मेरे कक्ष में प्रवेश
करोगे तो सुचना करके ही प्रवेश करोगे ।
जिस दिन आप वचन तोङेगें मै उसी दिन स्वर्ग लोक लौट जाउगीं, राजा ने वचन दे दिया ।
कुछ समय बाद धांधलजी के घर मे पाबूजी के रूप मे अप्सरा मदुधौखा रानी के गर्भ से एक पुत्र का जन्म होता है ।
समय अच्छी तरह बीत रहा था, एक दिन भूल वश या कोतुहलवश धांधलजी अप्सरा रानी के कक्ष में बिना सूचित किये प्रवेश कर जाते है ।
वे देखते है कि अप्सरा रानी पाबूजी को सिंहनी के रूप मे दूध पिला रही है ।
राजा को आया देख अप्सरा अपने असली रूप मे आ जाती है और राजा धांधलजी से कहती है कि "हे राजन आपने अपने वचन को तोङ दिया है इसलिये अब मै आपके इस लोक में नही रह सकती हूं ।
मेरे पुत्र पाबूजी कि रक्षार्थ व सहयोग हेतु मै दुबारा एक घोडी ( केशर कालमी ) के रूप में जनम लूगीं ।
यह कह कर अप्सरा रानी अंतर्ध्यान हो जाती है ।
समय बीत गया और पाबूजी महाराज बड़े हो गए, गुरू समरथ भारती जी द्वारा उन्हें शस्त्रों की दीक्षा दी जाती है ।
धांधल जी के निधन के बाद नियमानुसार राजकाज उनके बड़े भाई बुङा जी द्वारा किया जाता है ।
गुजरात राज्य मे आया हुआ गाँव " अंजार " जहाँ पर देवल बाई चारण नाम की एक महिला रहती थी ।
उनके पास एक काले रंग की घोडी थी, जिसका नाम केसर कालमी था !
उस घोडी की प्रसिद्धि दूर दूर तक फैली हुई थी ।
उस घोडी को को जायल (नागौर) के जिन्दराव खींची ने डोरा बांधा था, और कहा कि यह घोडी मै लुंगा, यदि मेरी इच्छा के विरूद्ध तुम ने यह घोडी किसी और को दे दी तो मै तुम्हारी सभी गायों को ले जाउगां ।
एक रात श्री पाबूजी महाराज को स्वप्न आता है और उन्हें यह घोडी (केशर कालमी) दिखायी देती है, सुबह वो इसे लाने का विचार करते है ।
श्री पाबूजी महाराज अपने खास चान्दा जी, ढ़ेबाजी को साथ में लेकर अंजार के लिये रवाना होते है ।