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पिताजी जब भी कभी किसी से क्रोध में होते थे। तो कहते थे ' श्री ' हीन हो गया है।
बहुत बार सुनने पर एक बार जब शांति से बैठे थे। मैंने पूछा श्री का अर्थ क्या होता है ?
बोले व्यक्तित्व के जो श्रेष्ठतम गुण होते हैं। वह सभी श्री में समाहित होते है। ऋग्वेद में सबसे पहले यह शब्द प्रयुक्त हुआ है।
इसका अर्थ होता है कि वह शक्ति जिससे अपना और इस जगत का विकास किया जाता है।
मैं जब अपनी लैब खोला तो बहुत से लोगों ने बहुत नाम सुझाये। लेकिन पिताजी कि व्याख्या स्मृति हो आई।
फिर मैंने ' श्री ' पैथोलॉजी रखा।।
बनारस TATA कैंसर इंस्टीट्यूट में श्री पैथोलॉजी कि प्रति सप्ताह एक दो रिपोर्ट कैंसर कि जाती है।
ल्यूकीमिया, ओरल, लिम्फोमा कैंसर कि रिपोर्ट सबसे अधिक होती है।
बनारस से मेरे पास दो histopathology के लिये जॉब ऑफ़र आये हैं।
लेकिन अब घर छोड़कर कहीं जाने का मन नही है। एक घँटे के लिये प्रति सप्ताह बनारस आ सकते हैं। इसको स्वीकार कर लें तो किया जा सकता है।
यह है कि जौनपुर में लैब का कलेक्शन सेंटर बढ़ा रहे हैं। जिससे अधिक लाभ सबको मिल सके।
बाकी हम को तो जान ही रहे हैं। कब झोला उठाकर चल दें, यह अलग बात है कि थर्ड टर्म के लिये कोशिश जारी है।😊
भगवान के श्रीचरणों में विश्वामित्र, अगस्त्य जैसे ऋषियों ने अस्त्र रख दिये।
स्वयं मर्यादापुरुषोत्तम शिव, देवी, सूर्य कि उपासना किये। किष्किंधा से लेकर मलय, जावा तक कि सम्पूर्ण वनवासी जातियों, भील आदि उनके साथ युद्ध किया।
इस प्रलयकारी युद्ध में रावण को मारकर लंका पर विजय प्राप्त किये।
उसी लंका को ईश्वर विभीषण को सौंप देते हैं। स्वयं उसी गेरुआ वस्त्र में अयोध्या लौट आते हैं।
उनकी स्थापित की गई यह मर्यादा समस्त जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा है। हम कर्म करें, संघर्ष करें कुछ भी प्राप्त करने के लिये अपना सब कुछ अर्पित कर दें। लेकिन जो कुछ भी प्राप्त हो, उसके प्रति मोह, उसको अपना ही समझने की भूल ही समस्या हैं।
वह सब कुछ जो प्राप्त है। वह इस जगत का है, उसी को सौंप देना है।
जैसा कि मनुष्यों के भगवान बुद्ध ने कहा था।
सब दुख ही है।
पाने का दुख, फिर जो मिला है उसको बनाये रखने का दुख। अंतः उसके खो जाने का दुख। सब दुख ही दुख है।
मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम यही शिक्षा देते है। जो मिला है, वह अपना है ही नही। तो पाने, बनाये रखने, खोने का कोई दुख ही नही हैं।।