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ये केवल विधर्मियों द्वारा फैलाया मिथ्याभ्रम है कि हम भारतवासी कभी एक होकर लड़े नहीं।
लुटेरे सुबुक्तगीन और उसका धूर्त पुत्र महमूद गजनवी भारत लूट से पूर्व पीर फकीर, तांत्रिक मुल्ला आदि के वेश में गुप्तचर भेजा करते थे। ये गुप्तचर भारतीय राज्यों में हिंदू जनता के सामने ऐकेश्वरवाद की बातें करते थे। भारत की धर्मसहिष्णु जनता ने इन्हे समाज में उचित स्थान और सम्मान दिया। ये कृत्रिम फकीर राज्य की महत्वपूर्ण जानकारियां महमूद तक भिजवाते थे। मुल्तान में कुछ फकीरों ने वहां के चाहमान शासक अजयपाल के दरबार तक अपनी पहुंच बना ली थी। राजा अजयपाल अत्यंत शक्तिशाली थे, फकीरों के वेश में गुप्तचरों ने जब उनके सामर्थ्य का बखान महमूद के समक्ष किया तो उसने मुल्तान पर सीधे और प्रथम आक्रमण का विचार त्याग दिया। जब महमूद ने सिंध लूट की योजना बनाई तो वहां के गुप्तचरों ने सैंधव राजा हम्मूक के विषय में भी वही बताया जो राजा अजयपाल के विषय में बताया था, इस कारण सिंध लूट की योजना भी मात्र योजना ही रह गई। इस स्थिति में महमूद ने राजपुताने में घुसकर चाहमानों के शाकंभरी राज्य में लूट की योजना तैयार की। महमूद जानता था, शाकंभरी के बाद आगे की लूटयात्रा सरल हो जायेगी। राजपुताने का सीमावर्ती राज्य तनोट था जिसके शासक विजयराज (प्रथम) भाटी थे। जब उन्हें महमूद की योजना का भान हुआ उन्होंने तुरंत इसकी सूचना अपने मित्र राजा गोविंद तृतीय को भिजवाई। राजा गोविंद तृतीय ने इस म्लेच्छ आक्रमण की सूचना राजा भोज परमार को भिजवाई। राजा भोज परमार शीघ्र ही अपनी सेना लेकर राजा गोविंद तृतीय की सेना के साथ तनोट पहुंच गए। जब महमूद ने तनोट पर आक्रमण किया तब उसका सामना भाटी राजा विजयराज प्रथम के भुजदंडों, परमार राजा भोज की अमोघ युद्धनीति एवं चाहमान राजा गोविंद तृतीय की चमकती तलवार से हुआ। युद्ध आरंभ होने के कुछ ही घंटों में महमूद की सेना तितर बितर हो गई। तीनों राजाओं का युद्ध कौशल चमत्कृत करने वाला था। महमूद ने दूर से देखा जब राजा विजयराज भाटी ने एक म्लेच्छ सैन्य अधिकारी की भुजाएं अपनी भुजाओं से उखाड़ कर अलग कर दीं। काल का ऐसा भीषण स्वरूप देखकर महमूद कुछ क्षणों के लिए अपना चित्त खो बैठा। या अल्लाह आज जान बख्श दे, महमूद केवल यही दुआ कर रहा था। किसी प्रकार सचेत होकर अपनी बची कुची सेना लेकर महमूद वापस भाग गया।
यद्यपि हम तनोट युद्ध में विजयी हुए तथापि इस विजय का विशेष लाभ भारत को नहीं मिल सका। तनोट युद्ध में वास्तविक विजय तो महमूद के वध से होनी थी। महमूद को पटकने, समर्पण कराने एवं वापस भगाने वाले कई राजा, सामंत एवं योद्धागण हुए किंतु महमूद बार बार आक्रमण करता रहा और इस देश को लूटता रहा।
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