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यह कौन लोग हैं, जो कभी पुस्तकालय नहीं गये। जो कभी चिंतन नहीं किये।
हम चाहते तो इस पोस्ट पर टिप्पणी कर देते, लेकिन यह दिखाना आवश्यक है। हमारी #व्याख्याएं_कितनी_मूर्खतापूर्ण हैं। जिसको पचासों लोग पसंद भी करते हैं।
यदि श्रीकृष्ण बिना लड़े युद्ध में जीत दिला दिये, तो गीता उपदेश क्यों दिया था ? बिना लड़े ही जीत दिलानी थी तो उपदेश की क्या आवश्यकता थी...?????
युद्ध करने के लिये, कर्म करने के लिये ही तो उनको इतना रहस्यपूर्ण, उच्च आध्यात्मिक उपदेश देना पड़ा।
बिना कर्म के वह कुछ देंगे.... ऐसा आश्वासन तो उन्होंने कभी नहीं दिया।।
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कभी भी किसी को भी #कर्ण_जैसा_मित्र_न_मिले।
मित्र का प्रथम कर्तव्य है कि मित्र का सही मार्गदर्शन करे। निःसंकोच होकर गलत को गलत, सत्य को सत्य कहे।
ऐसा मित्र जिसके आश्वासन पर मित्र युद्घ लड़ रहा है। मित्रता से महत्वपूर्ण उसका दानी होना हो गया। कवच कुंडल दान कर देता है।
ऐसा मित्र जो भरी सभा में, मित्र को एक स्त्री को अपमानित करने के लिये उकसाता है, #क्या_ऐसा_मित्र_आप_चाहते_है ?
जिसकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, उसके मित्र के कुल के विनाश का कारण बन जाये। वह मित्र नहीं है, बल्कि हजार शत्रुओं से भी बड़ा शत्रु है।।

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यहाँ लाशें भी बिकती हैं बाजार में!
खरीदार बहुत हैं, बेचने वाला चाहिए!!

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आदरणीय Ravishankar Singh जी की कलम से
नमन देव तुल्य बाऊ जी ( डॉ साहब के पिताजी को )
जंहा तक मुझे याद है। धर्म , दर्शन पर यह हमारी उनकी अंतिम वार्ता थी। जो मुझे प्रतिदिन याद आती है। इससे मैं बहुत प्रभावित भी हुआ था।
मैंने पिताजी से पूछा। इस संसार में इतना दुख, पीड़ा, कष्ट क्यों है। जबकि मनुष्य तो विकास ही किया है।
वह थोड़ी देर तक मौन रहे। बोले यह प्रश्न इतना सरल नही है। ऐसे प्रश्नों की खोज में बुद्ध, महावीर को गृह त्याग करना पड़ा।
लेकिन जो तुम मुझसे जानना चाहते हो। वह मैं बता रहा हूँ। वही सनातम सत्य है।
वह अपनी बात एक कथा से शुरू करते है।
जब लंका में युद्ध समाप्त हो गया। भगवान राघवेंद्र एकांत कुटिया में चिंतित अवस्था मे बैठे थे।
ईश्वर कि मनोदशा देखकर ब्रह्मांड कि सभी शक्तियों में हलचल पैदा हो गई।
मर्यादापुरुषोत्तम का चिंतन वही है। जो तुम्हारा प्रश्न है। वह यह सोच रहे थे। मनुष्य को क्या हो गया है।
सर्वप्रथम ब्रह्मा जी उनके सामने प्रकट हुये। वह जो कह रहे हैं। वही उपनिषदों का भी निहतार्थ है। जिसे गोस्वामीजी बहुत सरलता से लिखतें है।
अब दीन दयाल दया करिये
मति मोरी विभेदकरी हरिये।
जेहिते बिपरीत क्रिया करिये,
दुख सो सुख मान सुखी चरिये।।
तो ब्रह्मा जी कहते है।
लगता है प्रभु मुझसे गलती हो गई है। यह मनुष्य कि बुद्धि में विभेद पैदा हो गया है।वह दुख को सुख मानकर जीवन जीता है। इस विभेद को प्रभु ठीक कर दीजिये।
#पिताजी कहते है। जिसे तुम दुख मान रहे हो। क्या वह दुख ही है। जिसे तुम अपना कहते हो। क्या वह तुम्हारे अपने ही है।
क्या तुम्हारा चिंतन ठीक है। या तुम्हारी पीड़ा, दुख, कष्ट यह सब तुम्हारी बुद्धि ने कृतिम रूप से पैदा किया है।
यह जो कार लिये हुये हो। तुम्हे कैसे लगता है। यह सुख का साधन है। इस भौतिक जगत में कुछ भी सुख नही दे सकती हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नही है। कि त्याग दो।
उससे बंध मत जाओ। यह सब कुछ साधन है।
साध्य तो एक ही है। वह ईश्वर ! उसी से सुख , आनंद है।

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18वी -19 शताब्दी के वर्षों में यूरोप विशेषकर फ्रांस, जर्मनी और भारत में अस्तिववादी दार्शनिक, कवि पैदा हुये।
सात्र, मामू, विवेकानंद , ओशो, अरविंद घोष, महर्षि रमण आदि। इसमें सात्र, मामू नोबेल पुरस्कार भी पाये।
पश्चिम के अस्तिववादी मार्क्सवाद से प्रभावित थे। भारत के अस्तिववादी आध्यात्मिक थे।
पोप, पादरी, इमाम, मौलाना से पश्चिम इतना पीड़ित था। कि उसे धार्मिकता से घृणा सी हो गई थी। नही तो भारतिय चिंतक भी उसी श्रेणी के थे।
इसका पहला आध्यात्मिक चिंतन गीता में मिलता है। बाबा आम्प्टे गीता से इतने प्रभावित थे। कि उन्होंने मार्क्सवाद के लिये कहा। यह विचार गीता में पहले ही दिया जा चुका है। वह स्वयं मार्क्सवादी थे। लेकिन मार्क्सवादियों को सनातन धर्म से घृणा थी ! है भी। इसलिये उन्होंने बाबा आम्प्टे को पोलित ब्यूरो से निकाल दिया। बाद में बाबा आम्प्टे कुष्ठरोगियों के लिये जीवन समर्पित कर दिया।
गीता बहुत से विचारों को रखती है। जिसने भारतीय चिंतन को बहुत प्रभावित किया। कोई भी भारतिय मनीषा वह आदिशंकराचार्य हो या आधुनिक विचारक बिना गीता के उनका चिंतन पूर्ण नही होता।
श्रीकृष्ण ने गीता में वह कौन सी व्याख्या प्रस्तुत किया। जो अस्तित्ववाद, व्यक्तिवाद का प्रथम चिंतन कहा जाता है।
स्वधर्म ! यह गीता का उतना ही प्रभावी विचार है। जैसे निष्काम कर्म योग है।
जो धर्म को समझता है। वही स्वधर्म को भी समझ सकता है। उसी से जुड़ा परहित धर्म भी है।
धर्म का सम्बंध आत्मा से है। और आत्मा सबकी भिन्न है। आत्मा से ही स्वभाव पैदा होता है।
अपने स्वभाव के आधार पर कर्तव्यों को करना ही स्वधर्म है। इसलिये सबके अपने अपने स्वधर्म हो सकते है। मैं अपना संचालक, नियामक स्वयं हूँ ! दूसरा कोई नही है, न होना चाहिये।
जैसे मैं चिकित्सक हूँ। चिकित्सा के अपने नियम, व्यवस्था, परंपरा है। लेकिन मैं चिकित्सा का निर्वहन अपने स्वभाव के आधार पर करना चाहिये। यह मेरा स्वधर्म है।
स्वधर्म का महत्व इसलिये भी है। क्योंकि समाज, व्यवस्था, व्यक्ति सब कुछ गलत हो सकतें है। लेकिन आत्मा पवित्र होती है। उससे जो हम निर्धारित करते है। वह स्वधर्म है।
अधिकतर लोग दूसरे कि तरह जीवन जीना चाहते है। दुसरो कि तरह सफल होना चाहते है। वह यह नही समझते उनकी आत्मा क्या चाहती है। दूसरे का अनुसरण करके।अपने स्वधर्म को नष्ट कर देते है। जीवन भर असंतुष्ट रहते है।
यह बहुत व्यापक विषय है। जिस पर बात होनी चाहिये। जिससे सभी अपने स्वभाव के आधार पर जीवन जी सकें।।

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यहां यह छोटा सा मंदिर है।
यह कितनी अच्छी बात है। कि यहां पुजारी भी थे।
लेकिन यहां मंदिर का होना स्प्ष्ट संदेश था। कि यहां टनल, बाँध कुछ बनना नही चाहिये था।
यह किसी धार्मिक कारण से नही है। पूर्वज भूगोल, जैविकी के विद्वान थे।
आपको यदि याद हो। तो उत्तराखंड में जब त्रासदी आई थी। उसके प्रमुख कारणों में गौरा/ धारा देवी का मंदिर हटाना भी था। मैं इस त्रासदी में सेवार्थ गया भी था। मंदिर का स्थान ही सब कुछ बता रहा था।
हिमालय अब भी निर्माण अवस्था में है। वह उपर उठ रहा है। हमारे पूर्वजों ने मंदिर बनाकर, आपकी सुरक्षा के लिये स्थानों को चिन्हित किया था।
हिमालय देवभूमि है।
वहां निर्माण के साथ बाहर के लोगों के बसने पर रोक लगनी चाहिये।।

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