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दुख को दूर नही किया जा सकता ! न करना चाहिये।
दुख से ध्यान हटना चाहिये। मात्र हम यही कर सकते है। जो हम नही करते है।
जिसको कम करना है। या दूर करना है। उस पर ध्यान अधिक जाता है। फिर वह और बढ़ता है।
तो उपाय एक ही है।
दुख से ध्यान हटे।
ध्यान तब हटेगा, जब ध्यान कहीं और जाय।
वह है, सृजन।
सृजन, निर्माण नही है।
सृजन purposeless है।
वह कर्म जिसका कोई उद्देश्य ना हो।
वह पढ़ना भी सृजन, जिसके आधार पर कोई परीक्षा नही देनी हो। अपना ज्ञान न प्रदर्शित करना हो।
ऐसे वृक्ष को पानी देना भी सृजन है। जिससे फल लेने की चाह न हो।
ऐसा प्रेम भी सृजन है। जिसमे कोई चाह न हो।

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दुख को दूर नहीं किया जा सकता ! न ही इसकी कोशिश करनी चाहिये।
दुख से ध्यान हटना चाहिये। मात्र यही हम कर सकते हैं। जो हम नहीं करते हैं।
जिसको कम करना है या दूर करना है, उस पर ध्यान अधिक जाता है। फिर वह और बढ़ता है।
तो उपाय एक ही है।
दुख से ध्यान हटे।
ध्यान तब हटेगा, जब ध्यान कहीं और जाये।
वह है, सृजन।
सृजन, निर्माण नहीं है।
सृजन purposeless है।
वह कर्म जिसका कोई उद्देश्य ना हो।
वह पढ़ना भी सृजन है, जिसके आधार पर कोई परीक्षा नहीं देनी हो। अपना ज्ञान न प्रदर्शित करना हो।
ऐसे वृक्ष को पानी देना भी सृजन है जिससे फल लेने की चाह न हो।

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आदरणीय अपनी मित्र मंडली में शामिल करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद...
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अब मुझे इसका ज्ञान नही है। कि नीत्से कभी गीता पढ़े थे, या नहीं। लेकिन वह ईसाई रिलीजन के सबसे कठोर आलोचक थे। जिस रिलीजन ने आधी दुनिया में ' दास' पैदा किये। उसको नष्ट हो जाना चाहिये।
नीत्से इस आधुनिक दुनिया के सबसे अधिक प्रभावित करने वाले दार्शनिक थे। वह collective struggle, collective development को महत्व नही दिया।
लेकिन जिस सिद्धांत के लिये नीत्से को जाना जाता है। वह 'Eternal recurrence' शास्वत की पुनरावृत्ति। यह गीता के पुनर्जन्म सिद्धांत जैसा ही है। थोड़ा गीता में और भी स्पष्टता, पवित्रता है।
नीत्से कहता है। यही जीवन , जिसमें यही दुख, दर्द, पीड़ा, यादें है। पुनः ऐसे मिले तो क्या आप स्वीकार करेंगें ?
वह कहता है। हमको प्रसन्नता से स्वीकार करना चाहिये। नीत्से इस स्वीकार के लाभ को बताता है। उसका कहना है। इससे पता चलता है कि आपका इस पृथ्वी पर विश्वास है।
गीता! इसके बहुत गहरे अर्थ में जाती है। यद्यपि पुनर्जन्म का विचार वेद से ही है। लेकिन गीता ने ही पुनर्जन्म को सबसे प्रभावी ढंग से रखा है।
गीता कहती है। इसी सुख, दुख, पीड़ा के लिये। आपको बार बार पुनर्जन्म लेना ही है। यह आपकी इच्छा है या नही है। इस पर निर्भर नही करता है। इससे मुक्ति तभी मिलेगी, जब आपके सभी कर्मो का परिष्कार हो जायेगा।
गीता कहती है। जन्म का उद्देश्य ही स्वयं को पहले से अधिक परिष्कृत करना है। पुनर्जन्म इसी प्रक्रिया का चक्र है।
यह परिष्करण कैसे होगा ?
हमारे अपने कर्मो से होगा। यदि आप गीता को समझते है। तो गीता कहती है। आपका जन्म इसलिये नही हुआ है। कि आपको संसार कि रचना करनी है।
जन्म तो इसलिये हुआ है। आप पहले से अधिक परिष्कृत हुये या नही।
यदि हां ! तो आपको एक ऊंचे स्तर के चक्र में डाला जायेगा। यदि नही, तो नीचे स्तर के चक्र में।
यह ऊंचा स्तर एक समय इस चक्र से निकालकर मुक्त करके मोक्ष देगा।
अब इतने गहरे दर्शन में क्या छिपा है। गीता मनुष्य को कहा ले जा रही है।
वास्तव में गीता भी individual evolution पर ही जो दे रही है। यह मोक्ष कोई अलौकिक शब्द नही है।
हम जैसे जैसे अपने कर्मो को परिष्कृत करके आगे बढ़ते है। इस भीड़ से कटकर, एक अलग व्यक्तित्व के साथ। उन लोगों में सम्मिलित हो जाते है। जो महानतम परिवर्तन के आधार बनते है। वह जीवन का कोई भी क्षेत्र हो। ऐसे ही लोग संचालन करते है। यह व्यक्तित्व जीवन चक्रों के साथ हमारे जीन का भाग बन जाता है।
गीता जो कहती है। हमारी मुक्ति में संसार की मुक्ति है। इसका अर्थ यही है। अपने परिष्करण में हम इस संसार को बहुत कुछ देते है।
पुनर्जन्म का उद्देश्य! एक ऐसे व्यक्ति का जन्म है। जो भीड़ का हिस्सा न हो। वह अलौकिक शक्तियों से युक्त हो। इस जगत का मार्गदर्शन करे।
नीत्से ने इसे Superman कि संज्ञा दिया। नीत्से नास्तिक है। तो वह कारणों और अनिवार्यता पर जोर नही देता।
लेकिन गीता आध्यात्मिक है। तो पुनर्जन्म को अनिवार्य मानती है। मोक्ष पर सभी को अधिकार देती है।
मेरे पिताजी जो गीता के विद्वान थे। वह सैदव कहते थे।
मनुष्य को स्वयं के उद्धार पर विचार करना चाहिये। कोई दूसरा, किसी का उद्धार नही कर सकता है। सरल शब्दों में वही विचार है।

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यदि आप फिल्मों के शौकीन है।
चार फिल्मों में एक्टिंग नही देखी। तो फिर कही चूक हो गई है।
1- शौर्य फ़िल्म के के मेनन कोर्ट में 15 मिनट कि एक्टिंग।
2- वजूद फ़िल्म में लास्ट सीन में नाना पाटेकर कि एक्टिंग।
3- शूल में रवीना कि मृत्यु पर मनोज वाजपेयी कि एक्टिंग।
4- हासिल फ़िल्म में इरफान खान की एक्टिंग।
के के मेनन का अभिनय सर्वश्रेष्ठ है। यह हॉलीवुड कि फिल्मों को टक्कर देता है।।
वैसे वेडनसडे फ़िल्म में 15 मिनट का अभिनय नसरुद्दीन शाह भी इसी श्रेणी में है।।

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श्यामपुर खेरी कला में बड़े भाई शानू रांगड़ जी की मेहंदी रस्म समारोह में शामिल होते हुए।

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राजस्थान में योगी की दहाड़- हम कहते थे अयोध्या में राम मंदिर बनाएंगे, कांग्रेसी हंसते थे कि कैसे बनाओगे
#rajasthan | #kota | #yogiadityanath | #congress

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zionsseagoville changed his profile picture
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Ek Sach

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क्या आप इस बात से सहमत हैं ....
कल कमिश्नर साहब एक इंटरव्यू में बोल रहे थे ,कि लोग नशे की डिमांड कम कर दे नशा बेचने वाले नशा बेचना अपने आप बंद कर देंगे

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