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*JATT NU CHUDAIL TAKRI

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1527 ई. को खानवा के युद्ध में बाबर की सेना के विरुद्ध लड़ते हुए अपने 5 पुत्रों सहित वीरगति पाने वाले रावत रतनसिंह जी चुंडावत (सलूम्बर के चुंडावतों के पूर्वज)

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1550 ई. में जैसलमेर का तीसरा शाका कंधार के अमीर अली के आक्रमण के समय हुआ। इस समय दुर्ग में भाटी राजपूतों ने केसरिया तो किया, लेकिन जौहर नहीं हुआ, इसलिए इसे अर्द्धशाका कहते हैं। इस युद्ध में भाटी राजपूतों की विजय हुई। इस समय जैसलमेर के शासक महारावल लूणकरण भाटी थे।

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बचपन में ऐसे दिखते थे मुनव्वर फारूकी अब हो गए बेहद स्मार्ट

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साधू सिंह अपने बड़े भाई मकनू सिंह की हत्या से तिलमिलाया हुआ था। वह बदला लेने के लिए उतावला था। वह त्रिभुवन सिंह के हमले से बच गया था, लेकिन उसकी माँ गूदा देवी त्रिभुवन द्वारा चलाई गई गोली के कारण अपंग हो चुकी थी। साधू सिंह ने सोच लिया था कि यदि उसने अपने चचेरे भाईयों की हत्या नहीं की तो उसकी हत्या निश्चित है...

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ऋण (कर्ज़) का दुष्चक्र...

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