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लाखा तोप हिंदुआ सूरज ब्रजराज महाराजा सूरजमल सिंह जी के समय में बनाई गई थी। इसका नाम लाखा रंग से लिया गया। जिसे गेरुआं रंग भी कहते हैं।
यह दुनिया की विशालतम तोपों में से एक है। यह डीग किले में लाखा बुर्ज पर स्तिथ है। यह बुर्ज बहुत ऊंची है। लोग यह सोचकर हैरान हो जाते हैं कि उस समय इतनी ऊंचाई पर इतनी भारी तोप कैसे रखी गयी। लाखा तोप का इस्तेमाल 1761 में सिर्फ एक बार आगरा के लाल किले पर किया गया था। जून 1761 में महाराजा सूरजमल जी ने मुगलों की पहले की पुरानी व उस समय की दूसरी राजधानी कहे जाने वाले आगरा के किले पर आक्रमण कर दिया था।
तोप चलाने वाले तोपची ने तोप को मशाल से जलाकर पास की गहरी खाई में ऊंची बुर्ज से छलांग लगा दी थी थी ताकि उसे कोई नुकसान न हो।
तोप का गोला सीधे आगरा किले की दीवार पर जाकर लगाजे और दीवार टूट गयी। इससे जाट सैनिक तेजी से किले में घुस गए और मुगल सैनिकों को काट दिया। लाखा तोप चलने पर इतनी आवाज हुई के मुगल सैनिकों में डर के मारे अफरा तफरी मच गई और वे इधर उधर दौड़ने लगे। किले के मुगल गर्वनर ने भयभीत होकर महाराज के आगे घुटने टेककर आत्म समर्पण कर दिया था। उसके बाद जाटों ने लगभग 15 वर्ष तक आगरे के लाल किले पर राज किया।
तोप चलने की आवाज इतनी भारी थी कि बहुत सी गर्भवती महिलाओं का गर्भ गिर गया था। बहुत से लोग बहरे हो गए थे। इसलिए महाराज ने प्रजा की भलाई हेतू आगे से तोप के चलाने पर प्रतिबंध लगवा दिया था। इसके बाद लाखा तोप का इस्तेमाल कभी नहीं किया गया।
यह तोप अब भी किले में बुर्ज पर स्तिथ है। पर्यटक दूर दूर से इसे देखने आते हैं व इसके साथ फोटो लेकर गर्व महसूस करते हैं।