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18वी -19 शताब्दी के वर्षों में यूरोप विशेषकर फ्रांस, जर्मनी और भारत में अस्तिववादी दार्शनिक, कवि पैदा हुये।
सात्र, मामू, विवेकानंद , ओशो, अरविंद घोष, महर्षि रमण आदि। इसमें सात्र, मामू नोबेल पुरस्कार भी पाये।
पश्चिम के अस्तिववादी मार्क्सवाद से प्रभावित थे। भारत के अस्तिववादी आध्यात्मिक थे।
पोप, पादरी, इमाम, मौलाना से पश्चिम इतना पीड़ित था। कि उसे धार्मिकता से घृणा सी हो गई थी। नही तो भारतिय चिंतक भी उसी श्रेणी के थे।
इसका पहला आध्यात्मिक चिंतन गीता में मिलता है। बाबा आम्प्टे गीता से इतने प्रभावित थे। कि उन्होंने मार्क्सवाद के लिये कहा। यह विचार गीता में पहले ही दिया जा चुका है। वह स्वयं मार्क्सवादी थे। लेकिन मार्क्सवादियों को सनातन धर्म से घृणा थी ! है भी। इसलिये उन्होंने बाबा आम्प्टे को पोलित ब्यूरो से निकाल दिया। बाद में बाबा आम्प्टे कुष्ठरोगियों के लिये जीवन समर्पित कर दिया।
गीता बहुत से विचारों को रखती है। जिसने भारतीय चिंतन को बहुत प्रभावित किया। कोई भी भारतिय मनीषा वह आदिशंकराचार्य हो या आधुनिक विचारक बिना गीता के उनका चिंतन पूर्ण नही होता।
श्रीकृष्ण ने गीता में वह कौन सी व्याख्या प्रस्तुत किया। जो अस्तित्ववाद, व्यक्तिवाद का प्रथम चिंतन कहा जाता है।
स्वधर्म ! यह गीता का उतना ही प्रभावी विचार है। जैसे निष्काम कर्म योग है।
जो धर्म को समझता है। वही स्वधर्म को भी समझ सकता है। उसी से जुड़ा परहित धर्म भी है।
धर्म का सम्बंध आत्मा से है। और आत्मा सबकी भिन्न है। आत्मा से ही स्वभाव पैदा होता है।
अपने स्वभाव के आधार पर कर्तव्यों को करना ही स्वधर्म है। इसलिये सबके अपने अपने स्वधर्म हो सकते है। मैं अपना संचालक, नियामक स्वयं हूँ ! दूसरा कोई नही है, न होना चाहिये।
जैसे मैं चिकित्सक हूँ। चिकित्सा के अपने नियम, व्यवस्था, परंपरा है। लेकिन मैं चिकित्सा का निर्वहन अपने स्वभाव के आधार पर करना चाहिये। यह मेरा स्वधर्म है।
स्वधर्म का महत्व इसलिये भी है। क्योंकि समाज, व्यवस्था, व्यक्ति सब कुछ गलत हो सकतें है। लेकिन आत्मा पवित्र होती है। उससे जो हम निर्धारित करते है। वह स्वधर्म है।
अधिकतर लोग दूसरे कि तरह जीवन जीना चाहते है। दुसरो कि तरह सफल होना चाहते है। वह यह नही समझते उनकी आत्मा क्या चाहती है। दूसरे का अनुसरण करके।अपने स्वधर्म को नष्ट कर देते है। जीवन भर असंतुष्ट रहते है।
यह बहुत व्यापक विषय है। जिस पर बात होनी चाहिये। जिससे सभी अपने स्वभाव के आधार पर जीवन जी सकें।।

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यहां यह छोटा सा मंदिर है।
यह कितनी अच्छी बात है। कि यहां पुजारी भी थे।
लेकिन यहां मंदिर का होना स्प्ष्ट संदेश था। कि यहां टनल, बाँध कुछ बनना नही चाहिये था।
यह किसी धार्मिक कारण से नही है। पूर्वज भूगोल, जैविकी के विद्वान थे।
आपको यदि याद हो। तो उत्तराखंड में जब त्रासदी आई थी। उसके प्रमुख कारणों में गौरा/ धारा देवी का मंदिर हटाना भी था। मैं इस त्रासदी में सेवार्थ गया भी था। मंदिर का स्थान ही सब कुछ बता रहा था।
हिमालय अब भी निर्माण अवस्था में है। वह उपर उठ रहा है। हमारे पूर्वजों ने मंदिर बनाकर, आपकी सुरक्षा के लिये स्थानों को चिन्हित किया था।
हिमालय देवभूमि है।
वहां निर्माण के साथ बाहर के लोगों के बसने पर रोक लगनी चाहिये।।

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