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अंबाला के इस सिख खिलाड़ी ने एशियन गेम्स में रचा इतिहास, पिस्टल शूटिंग में जीता गोल्ड
दोस्तो, कहते हैं कि मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती। इस बात को अंबाला के सरबजोत सिंह जी ने सिद्ध करके दिखाया है।
अपनी मेहनत से सिर्फ 22 साल के सरबजोत सिंह ने एशियन गेम्स में पिस्टल शूटिंग मे गोल्ड मेडल जीत कर इतिहास रच दिया है। सरबजोत ने बताया कि वह रोज 60 से 70 किलोमीटर सफर तय करके प्रैक्टिस करने जाता थे।
इस मौके पर सरबजोत के माता-पिता बहुत खुश दिखाई दिए। उनका कहना है सरबजीत ने अंबाला के साथ-साथ भारत का नाम भी रोशन किया है। उन्होंने सरबजोत के कोच का भी धन्यवाद किया, जिन्होंने सरबजोत को इस लायक़ बनाया।
सरबजोत सिंह का कहना है कि वह आगे भी इसी तरह मेहनत करते रहेगें और अपने देश का नाम रोशन करते रहेंगे। दोस्तो, आप सरबजोत सिंह जी की इस जीत के लिए क्या कहना चाहेंगे।

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कुछ नहीं रेलवे वालों से बस इतना कहना कि चादर का कलर सफेद के अलावा किसी और रंग का कर दो यार, रात को अचानक देखने पर डर के मारे पंखा हिल जाता है 🤣 😳

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"GILLS AGRO INDUSTRY pays heartfelt tribute to Mahatma Gandhi and Lal Bahadur Shastri on their Jayanti. Their enduring legacies of peace and progress inspire us every day. 🇮🇳 .

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SHREE BHAWANI AGRO INDUSTRY fondly remembers the great Mahatma Gandhi and Lal Bahadur Shastri on their Jayanti. Their principles of simplicity and service to the nation continue to inspire us. 🇮🇳

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भारत के खिलाफ होने वाले वॉर्म अप मैच के लिए गुवाहाटी पहुंचने में इंग्लैंड की टीम को लगे 38 घंटे से ज्यादा का समय, जिसके बाद जॉनी बेयरस्टो ने सोशल मीडिया पर इसकी निराशा जाहिर की है.

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जिंदगी में किसी का साथ काफी है,
कंधे पर किसी का हाथ काफी हैं,
दूर हो या पास फ़र्क नही पड़ता,
सच्चे रिश्तों का तो बस एहसास काफ़ी हैं।

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आम्रपाली दुबे ने निरहुआ संग शुरू की 'मैं मायके चली जाउंगी' की शूटिंग
भोजपुरी सिनेमा इंडस्ट्री के जुबली स्टार दिनेश लाल यादव निरहुआ और भोजपुरी एक्ट्रेस आम्रपाली स्टारर 'मैं मायके चली जाउंगी' का निर्देशन शेखा और निर्माता परवीन हैं. दिनेश लाल यादव निरहुआ और आम्रपाली की जोड़ी जब भी साथ आती है तो पर्दे में धमाल मचाती है. इस जोड़ी को भोजपुरी सिनेमा जगत में सबसे अच्छी जोड़ियों में से एक माना जाता है. दोनों का किसी भी फिल्म में होना ही उसे हिट होना तय माना जाता है.

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"वीर आनन्दसिंह राठौड़ का अनोखा बलिदान"
1680 ई. में मुगल बादशाह औरंगज़ेब मेवाड़ पर हमला करने के लिए राजसमन्द झील किनारे पहुंचा। वह जिस तरह मेवाड़ में तबाही मचाता था, ये सोचकर महाराणा राजसिंह को लगा कि औरंगजेब राजसमन्द झील की पाल तुड़वा देगा।
महाराणा ने अपने राजपूत सर्दारों को अलग-अलग मेवाड़ी फौजी टुकड़ी के साथ राजसमन्द झील पर भेजा। मेवाड़ी फौज रास्ते में ही थी कि तभी बादशाही फौज में शामिल श्यामसिंह ने महाराणा को खत लिखा कि औरंगजेब को राजसमन्द बड़ा पसन्द आया है, इसलिए वह इसकी पाल नहीं तुड़ावेगा।
महाराणा ने सभी सर्दारों के नाम पत्र लिखकर उन्हें फौरन वापिस बुला लिया, लेकिन इसमें वणोल के आनन्दसिंह राठौड़ का नाम लिखना भूल गए।
दूसरे सब सर्दारों ने आनन्दसिंह राठौड़ को भी साथ में लौटने को कहा, तो आनन्दसिंह राठौड़ ने कहा कि "मैं जानता हूं कि मेरा नाम महाराणा सा ने भूल से नहीं लिखा, पर अब मेरा वापिस लौटना संभव नहीं, मैं अपने साथियों समेत यहीं मरूँगा"
नतीजतन आनन्दसिंह राठौड़ 100-200 बहादुर राजपूतों के साथ भिड़ गए हज़ारों मुगलों से और लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। महाराणा राजसिंह ने नौचौकी के दरवाज़े के बाहर आनन्दसिंह राठौड़ की संगमरमर की छतरी बनवाई, जो अब तक मौजूद है।

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