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विरासत
ये हल मेरे पिता जी ने 1968 में खरीदा था। जब तक जिंदा रहे इसको खूब चलाया। 2006 में पिता जी के देहांत के बाद छोटे चाचा जी ने भी इसके साथ खेती की। फिर इसको ऐसे ही लावारिस छोड़ दिया।
चाचा जी बताते हैं कि जब तेरे पिता जी हल चलाने लगे थे तो हल का मुन्ना उनसे ऊंचा होता था और मोड़ पर उछल कर पेट रखते थे मुन्ने पर और मोड़ लेते थे। जब पिता जी ने हल चलाना चालू किया तो दादा जी ने उसके बाद हल चलाना छोड़ दिया था।
दो साल पहले खेत में कोठड़ा बना रहे थे। लोकडाऊन के कारण मैं भी घर पर ही था तो खेत में काम करवाने में मेरी भी डयूटी लगी थी। पुराने कोठड़े को उधेड़ते हुए इन सब को बाहर खुले में डाल रखा था। एक दिन ऐसे ही छोटे चाचा जी से पूछा कि इनका क्या करोगे। तो वो बोले कि लकड़ी जला लेंगे और लोहा कबाड़ी में दे देंगे। 200-300 का चला जाएगा। मैने चाचा जी से कहा कि 500 ले लो ये मुझे दे दो। उनहोने मुझसे पूछा कि तू इसका क्या करेगा ये तो कबाड़ है ना ये अब चलने के लायक है। मैं बोला कि इसको सहज कर रखुंगा और इसकी मरमत भी करवाएंगे। चाचा जी बोले बेटा एक पैसा नी देना तुझे और जो पैसे लगे मुझे बता देना वो भी मैं दुंगा तू इसको ठीक करवा।
ऐसे ही खेत में काम करते वक़्त चाचा जी ने बताया कि ये हल तेरे पिता जी ने खरीदा था तो और भी ज्यादा लगाव हो गया इस से। घर का काम बाकी था तो जो सोच रहा था वो नहीं करवा पाया था इसका। अब घर का काम निपट गया तो इसको गांव के ही भाई विनोद मिस्त्री से सही करवा लिया। विनोद भाई ने जैसा सोचा था उस से कहीं अच्छा काम किया है। जहां से हल टुटा हुवा था उसको भी जैसे का तैसा ही रखा है बस हाल बदलवाई है क्योंकि पुरानी बिलकुल खत्म हो चुकी थी। कोके लगा कर और भी चार चांद लगा दिए हैं भाई ने। जुवा मिला नहीं था तो वो चाचा पाला ने दे दिया। अब ये विरासत बच्चों को भी याद रहेगी।
दोस्तों आंदोलन के दौरान बार्डर, टोल व धरणों पर बहुत से फेसबुक के साथी मिल जाते थे और पुछते थे कि भाई साहब आप किसानों के बारे में इतना लिखते हो आपको इसकी प्रेरणा कहां से मिलती है तो उनको इस हल की फोटो दिखा कर बोलता था कि इस हल को चला कर मेरे पिता जी ने मुझे पढ़ाया था और इस लायक बनाया था कि कुछ लिख सकूं। अब जब मैं लिख सकता हूँ तो क्यों ना लिखे किसान के बारे में और आंखों में पानी आ जाता था। ना जाने इसको देख कर कितनी बार रोया हूं। अब भी लिखते वक्त आंखों में पानी आ रहा है।
ये एक अहसास होता है अपनों के लिए जो शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।
विनोद भाई आपका दिल से शुक्रिया कि आपने इसको दोबारा से ऐसा बना दिया।
दोस्तों अगर आपके पास भी कोई पुरखों की निशानी है तो उसको सहेज कर रखें। हमने तो हल से खेती होती देखी है। कुछ इलाकों में आज भी होती है। लेकिन हमारी आने वाली पीढी इस को नहीं देख पाएगी। ये हमारी धरोहर है कि हमारे पुरखों ने कितनी मेहनत की है। जो समतल जमीन है आज देख रहे हैं ये सदा ही ऐसी नहीं थी। हमारे पुरखों ने बहुत मेहनत की है इसपर। खुन पसीने से सींचा है इसको।
अपने पुरखों का कर्ज हम कभी भी नहीं उतार सकते। इनको देख कर बच्चे भी सिखेंगे कि जो आज है उसको बनाने में कितनी मेहनत लगी है।