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सुबह स्कूल वैन चलाते हैं, शाम को गरीब बच्चों को पढ़ाते हैं। ये कहानी है ओडिशा के 50 वर्षीय नारायण प्रसाद सिंह की, जिन्होंने गरीबी और हालात के बावजूद अपने टीचर बनने के सपने को नहीं छोड़ा। कट्टक ज़िले के अनासपुर गांव के रहने वाले सिंह का बचपन बेहद साधारण परिवार में बीता।

1992 में उन्होंने बड़ी मेहनत से ग्रेजुएशन पूरा किया, लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से वो B.Ed नहीं कर पाए, जो एक टीचर बनने के लिए ज़रूरी था। कई स्कूलों में नौकरी के लिए आवेदन किया, लेकिन हर जगह से सिर्फ एक ही जवाब मिला "योग्यता अधूरी है।" मजबूरी में उन्होंने कमर्शियल ड्राइवर की नौकरी की, लेकिन मन हमेशा बच्चों को पढ़ाने में ही लगा रहा।

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सुबह स्कूल वैन चलाते हैं, शाम को गरीब बच्चों को पढ़ाते हैं। ये कहानी है ओडिशा के 50 वर्षीय नारायण प्रसाद सिंह की, जिन्होंने गरीबी और हालात के बावजूद अपने टीचर बनने के सपने को नहीं छोड़ा। कट्टक ज़िले के अनासपुर गांव के रहने वाले सिंह का बचपन बेहद साधारण परिवार में बीता।

1992 में उन्होंने बड़ी मेहनत से ग्रेजुएशन पूरा किया, लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से वो B.Ed नहीं कर पाए, जो एक टीचर बनने के लिए ज़रूरी था। कई स्कूलों में नौकरी के लिए आवेदन किया, लेकिन हर जगह से सिर्फ एक ही जवाब मिला "योग्यता अधूरी है।" मजबूरी में उन्होंने कमर्शियल ड्राइवर की नौकरी की, लेकिन मन हमेशा बच्चों को पढ़ाने में ही लगा रहा।

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सुबह स्कूल वैन चलाते हैं, शाम को गरीब बच्चों को पढ़ाते हैं। ये कहानी है ओडिशा के 50 वर्षीय नारायण प्रसाद सिंह की, जिन्होंने गरीबी और हालात के बावजूद अपने टीचर बनने के सपने को नहीं छोड़ा। कट्टक ज़िले के अनासपुर गांव के रहने वाले सिंह का बचपन बेहद साधारण परिवार में बीता।

1992 में उन्होंने बड़ी मेहनत से ग्रेजुएशन पूरा किया, लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से वो B.Ed नहीं कर पाए, जो एक टीचर बनने के लिए ज़रूरी था। कई स्कूलों में नौकरी के लिए आवेदन किया, लेकिन हर जगह से सिर्फ एक ही जवाब मिला "योग्यता अधूरी है।" मजबूरी में उन्होंने कमर्शियल ड्राइवर की नौकरी की, लेकिन मन हमेशा बच्चों को पढ़ाने में ही लगा रहा।

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सुबह स्कूल वैन चलाते हैं, शाम को गरीब बच्चों को पढ़ाते हैं। ये कहानी है ओडिशा के 50 वर्षीय नारायण प्रसाद सिंह की, जिन्होंने गरीबी और हालात के बावजूद अपने टीचर बनने के सपने को नहीं छोड़ा। कट्टक ज़िले के अनासपुर गांव के रहने वाले सिंह का बचपन बेहद साधारण परिवार में बीता।

1992 में उन्होंने बड़ी मेहनत से ग्रेजुएशन पूरा किया, लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से वो B.Ed नहीं कर पाए, जो एक टीचर बनने के लिए ज़रूरी था। कई स्कूलों में नौकरी के लिए आवेदन किया, लेकिन हर जगह से सिर्फ एक ही जवाब मिला "योग्यता अधूरी है।" मजबूरी में उन्होंने कमर्शियल ड्राइवर की नौकरी की, लेकिन मन हमेशा बच्चों को पढ़ाने में ही लगा रहा।

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सुबह स्कूल वैन चलाते हैं, शाम को गरीब बच्चों को पढ़ाते हैं। ये कहानी है ओडिशा के 50 वर्षीय नारायण प्रसाद सिंह की, जिन्होंने गरीबी और हालात के बावजूद अपने टीचर बनने के सपने को नहीं छोड़ा। कट्टक ज़िले के अनासपुर गांव के रहने वाले सिंह का बचपन बेहद साधारण परिवार में बीता।

1992 में उन्होंने बड़ी मेहनत से ग्रेजुएशन पूरा किया, लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से वो B.Ed नहीं कर पाए, जो एक टीचर बनने के लिए ज़रूरी था। कई स्कूलों में नौकरी के लिए आवेदन किया, लेकिन हर जगह से सिर्फ एक ही जवाब मिला "योग्यता अधूरी है।" मजबूरी में उन्होंने कमर्शियल ड्राइवर की नौकरी की, लेकिन मन हमेशा बच्चों को पढ़ाने में ही लगा रहा।

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1992 में उन्होंने बड़ी मेहनत से ग्रेजुएशन पूरा किया, लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से वो B.Ed नहीं कर पाए, जो एक टीचर बनने के लिए ज़रूरी था। कई स्कूलों में नौकरी के लिए आवेदन किया, लेकिन हर जगह से सिर्फ एक ही जवाब मिला "योग्यता अधूरी है।" मजबूरी में उन्होंने कमर्शियल ड्राइवर की नौकरी की, लेकिन मन हमेशा बच्चों को पढ़ाने में ही लगा रहा।

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1992 में उन्होंने बड़ी मेहनत से ग्रेजुएशन पूरा किया, लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से वो B.Ed नहीं कर पाए, जो एक टीचर बनने के लिए ज़रूरी था। कई स्कूलों में नौकरी के लिए आवेदन किया, लेकिन हर जगह से सिर्फ एक ही जवाब मिला "योग्यता अधूरी है।" मजबूरी में उन्होंने कमर्शियल ड्राइवर की नौकरी की, लेकिन मन हमेशा बच्चों को पढ़ाने में ही लगा रहा।

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सिर्फ 1 साल 9 महीने की उम्र में महाराष्ट्र के रत्नागिरी की नन्ही वेदा परेश सराफरे ने वो कर दिखाया, जो बड़े भी सपना देखते हैं। वेदा ने 100 मीटर तैराकी सिर्फ 10 मिनट 8 सेकंड में पूरी कर इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में देश की सबसे कम उम्र की तैराक बनने का खिताब अपने नाम कर लिया।
यह सफर एक सरकारी स्विमिंग पूल से शुरू हुआ, जहां वह अपने बड़े भाई को तैरते देखती थीं। सिर्फ 9 महीने की उम्र से कोच महेश मिल्के और उनकी पत्नी गौरी के मार्गदर्शन में 11 महीने की ट्रेनिंग के बाद यह चमत्कार संभव हुआ।
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