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साक्षी की जीत सूचक है इस बात की कि कोई चुनाव जीतने के लिए सिर्फ महिला आरक्षण की आवश्यकता नहीं है, जो महिलाएं कहती हैं जब सीट आरक्षित होगी मैं तभी चुनाव लडूंगी उनके पूर्वाग्रह को हमारी छोटी बहन साक्षी तिवारी ने तोड़ा है, ऋषिकेश पीजी कॉलेज जिसने इस उत्तराखंड को महिला अध्यक्ष दी (शायद Co Ed महाविद्यालय में अकेली) अध्यक्ष चुनाव लडना और जीतना अपने आप में मिशाल है अन्य छोटे भाई बहनों के लिए। Gender assessment, लैंगिक अनुपात, महिलाओं का राजनीति में प्रतिभाग, महिला विधेयक जैसे चम चमाते सर्वनाम आज साहित्य अमृत तो लगते है पर मार्किट में परिवारों में समाज में कहीं खो से जाते हैं, उसी साहित्या को आज बल देने का कार्य साक्षी की जीत ने किया है। ऋतिक पाठक और अकाश उनियाल जैसे तेज तर्रार युवा इस चुनाव को हारे तो हैं पर निराश न हों, राजनीति में कुछ भी अंतिम नहीं होता है। NSUI को जहां इस जीत से सीख लेनी चाइए कि आयातित प्रत्याशीयो के भरोसे ये चुनाव तो जीत गए परंतु बहुत लंबा ऐसा नहीं चल सकता, वहीं अखिल भारतीय परिषद को भी अपने नेताओं को कम और जमीनी रूप से छात्रों के बीच ज्यादा सक्रीय होने की आवश्यकता है, कुछ बदलाव गुरु द्रोणाचार्य और गुरु कृपाचार्य के स्तर पर चुनाव लड़ाने वाले #भाईजी लोगों को भी करने होंगे, बहर-हाल NSUI को अच्छे प्रबंधन और अच्छी नेटवर्किंग के लिए बधाई बहुत बहुत।