क्या अर्जुन कायर था?

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।यह गीता का उद्घोष है।

अब एक अपनी पढ़ी हुयी कथा पढ़ें... और फिर निर्णय करें।

जब पाण्डव १३ वर्ष का वनवास काट रहे थे तभी श्रीकृष्ण ने पांडवों को सलाह दी थी कि कलियुगावतार दुर्योधन हर ढंग का छल कपट करेगा परन्तु राज्य वापस नहीं करेगा और अन्ततः युद्ध करना ही पड़ेगा।

और चूँकि वह अप्रत्यक्ष तैयारी अभी से ही कर रहा है अतः उसकी सेना भी संख्याबल में बड़ी होगी।

बहुत संभव है कि भीष्म द्रोणाचार्य कृपाचार्य जैसे महारथी भी उसके पक्ष में रहें अतः अर्जुन को तपस्या करके देवताओं से और अस्त्र प्राप्त करना चाहिये।

सलाह मानकर अर्जुन घनघोर वन में तपस्या करने चला गया। तपस्या में लीन अर्जुन को एक दिन जंगली सुअर की ध्वनि सुनायी दी और उसे लगा कि उस पर वह सुअर हमला कर देगा और तुरंत अर्जुन ने पास में रखे गांडीव का प्रयोग करके वाण चला दिया।

पर जब सुअर गिरा तो अर्जुन ने देखा कि सुअर के उपर दो वाण लगे हैं और कुछ समय पश्चात ही एक किरात आया और अर्जुन से बोला कि उसके वाण से सुअर मरा है तथा अर्जुन का वाण बाद में लगा है।

बातचीत में ही विवाद बढ़ गया और किरात ने अर्जुन को युद्ध करने को ललकारा।

हालाँकि अर्जुन तपस्यारत था पर क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुये उसने चुनौती स्वीकार कर ली और पिनाक से युद्ध होने लगा।

वह किरात कोई साधारण किरात नहीं बल्कि स्वयम् शिव थे और शिव को युद्ध में देखकर उनके लाखों गण भी अर्जुन पर टूट पड़े। वन के महात्माओं को पता चला और उन्होंने अर्जुन से कहा कि तुम तपस्या करने आये हो तुम्हें पाण्डवों की सहायता करके दुर्योधन को हराना है और तुम उद्देश्य से भटक कर यहीं युद्ध में क्यों उलझ रहे?

अर्जुन ने महात्माओं से कहा कि वह क्षत्रिय है और युद्ध की चुनौती को अस्वीकार कर ही नहीं सकता। उसे काल का वरण स्वीकार है परन्तु वह चुनौती से भाग नहीं सकता।

परमशिव ने जब अर्जुन का यह दृढ़ विश्वास देखा तो विश्वास की परम मूर्ति शिव ने प्रसन्न होकर अर्जुन को पाशुपतास्त्र भेंट किया।

अब आप तय करें कि निहत्था और तपस्यारत जब अर्जुन अकेले ही काल से भी भिड़ सकता है तो उसे किसी भी अवस्था में कायर कहना क्या, साक्षात शिव या श्री हरि नारायण का ही अपमान नहीं है?

नोटः कथाएँ थोड़े थोड़े अन्तर के साथ आपने पहले भी पढ़ी होंगी पर आप अपने हृदय से पूछें कि दद्दाओं का अर्जुन को कायर बताना कितना बड़ा ढोंग और कपट है। क्या ढोंगी और कपटी सनातन धर्म की रक्षा वास्तव में कर रहे हैं?

निर्णय आपका। मैं फ़ेसबुक त्यागने हेतु तत्पर हूँ परन्तु धर्म के पक्ष से विमुख नहीं हो सकता।

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Kripa Shankar Bawalia Mudgal जी की पोस्ट :

यह उपग्रह चित्र — भारतीय मौसम विभाग द्वारा जारी अभी डेढ़ घंटे पूर्व का है, जो गुजरात तट पर आए चक्रवात को दिखाता है।

मौसम के बारे में अनुमान सिर्फ चित्र से ही नहीं लगाया जा सकता। उसके लिए और भी डाटा चाहिए जो मौसम विभाग के पास ही होता है। अतः वे ही सही भविष्यवाणी कर सकते हैं।

कम दबाव के क्षेत्र के केंद्र की सही स्थिति, वहाँ का तापमान, वहाँ के वातावरण का बेरोमेट्रिक प्रेशर, केंद्र के मूवमेंट की दिशा और गति, केंद्र के चारों ओर बह रही हवाओं की गति और दिशा, आदि की जानकारी के बिना कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।
यह एक दक्षता प्राप्त विशेषज्ञों का काम है, जो अपना काम भलीभाँति कर रहे हैं। पूरे देश के चुने हुए कुछ स्थानो से मौसम विभाग के रॉकेट या गुब्बारे छोड़े जाते हैं जो विभिन्न ऊंचाइयों पर तापमान, वायु के दबाव, गति और दिशा आदि की जानकारी देते हैं।
समुद्र में भी कुछ चुने हुए स्थानों पर एक उपकरण जल में उतारा जाता है, जो विभिन्न गहराइयों पर तापमान, जल के प्रवाह की दिशा आदि का डाटा देता है जिसका उपयोग भी मौसम विभाग करता है।

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More about in India की पोस्ट :

ये अंग्रेजी इंजीनियर वाला हावड़ा ब्रिज घूम के एक चीज समझ नही आया की 100 साल से इसका एक नट नहीं खुला है और हमरा बिहार वाला साल में दो बार टूट के गिर जाता है 😀

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भारत का इतिहास स्वर्णिम ही नहीं है... अत्याचारों, दु:खों से भरा है।
1947 में भारत में औसत आयु मात्र 34 वर्ष थी। आज कोई भी इस पर विश्वास नही कर सकता है।
लेकिन इन सभी दर्दनाक घटनाओं में से सबसे बड़ी घटना चुननी हो तो क्या होगी?....
वह है नालंदा विश्वविद्यालय का बख्तियार खिलजी द्वारा जलाया जाना।
यही विश्वविद्यालय था जिससे व्हेनसांग 10 हजार प्रतिलिपि बनाकर लेकर गया था। इसी के साथ विक्रमशिला जला दी गई।
भारत का सारा ज्ञान, विज्ञान, धर्म, चिकित्सा, ज्योतिष नष्ट हो गई। कुछ शास्त्र छिपाकर नेपाल ले गये। दक्षिण में बचे रहे।
इस तरह अपने धर्म को बचाने के लिये भारतीय पीढ़ी दर पीढ़ी कथानक को ले जाते। रामायण, महाभारत ऐसे ही आगे बढ़ाया गया। कुछ समय पूर्व तक बच्चे अपने माता पिता से ही रामायण, महाभारत सुनते थे।
भक्तिकाल में कवियों ने लोकस्रुतियो, अपने भक्ति, तप से नये ग्रन्थ रचे... जो समाज के लिये बड़े उपयोगी रहे।
1923 में गीताप्रेस की स्थापना हुई थी। मैं उसके इतिहास पर नहीं जाता, वह कहीं भी मिल जायेगा।
गीताप्रेस ने पुस्तकों को ही प्रकाशित किया ऐसा नहीं है। नेपाल, दक्षिण भारत से पांडुलिपियो का खोजा। महाभारत की मूलप्रतियाँ चार पाँच स्थानों पर मिली। उनको क्रम से जोड़ना, फिर इसी तरह उपनिषद को पूरे देश में खोजकर क्रमबद्ध किया।
इन सभी ग्रंथों को प्रकाशित करके, जनमानस तक पहुँचाया।
गीताप्रेस न होता तो संभव था कि हम जानते ही नहीं कि हमारे पूर्वजों ने इतने महान ग्रँथ रचे थे।
गीता प्रेस की विश्वसनीयता इतनी अधिक है कि प्रकांड विद्वान भी कोड करता है कि यह गीताप्रेस से प्रकाशित पुस्तक है।
प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने हनुमान प्रसाद पोद्दार को भारत रत्न देने का प्रस्ताव गोविंदबलभ पंत से भेजा। लेकिन उन्होंने लेने से मना कर दिया।
2014 में गीताप्रेस ने जो आँकड़े जारी किये थे —
54 करोड़ पुस्तकें प्रकाशित किया था।
12 करोड़ गीता,
11 करोड़ रामचरित मानस,
9 करोड़ रामायण, महाभारत,
2.5 करोड़ पुराण, उपनिषद
पत्रिका, चालीसा, कथानक आदि।
2.5 लाख प्रति प्रतिदिन प्रकाशित होती है।
ऐसा अप्रतिम उदाहरण मनुष्य के इतिहास में नहीं है।
गीताप्रेस हमारे लिये 'गीता' की भाँति ही आस्था है। तक्षशिला, नालंदा की भांति आदरणीय है।
उसके सामने कोई भी पुरस्कार महत्वहीन है।

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Bailuna Hats غيرت صورتها الشخصية
3 سنوات

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एक पूरा राज्य हमारे देश का , जल🔥रहा है , लोग घर छोड़ कर भाग रहे है , मगर 'उन्हें' फिक्र नहीं
ये देशभक्ति नहीं है ❗

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evrydy evrydy غير صورته الشخصية
3 سنوات

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