3 yıl - çevirmek

दरकती दीवारों की मरम्मत जरुरी है।
घर के बुजुर्गों से मोहब्बत जरुरी है।।
तुमने तो करवा लिया बीमा अपना-
पर पूछना उनकी तबियत ज़रूरी है।
उन्हे भी हक है जश्न-ए-रोशनाई का-
हमारी धरोहरों की जीनत जरुरी है।
थामा था जिन्होंने तुम्हारा नन्हा हाथ-
उन धूजते हाथों को हिम्मत ज़रूरी है।
तुम पूज लो नई तिजोरियों को मगर-
पुराने गल्ले की भी इबादत ज़रूरी है।
नये खून की सरपरस्ती मंज़ूर होगी-
पर किसी पुराने की ज़मानत ज़रूरी है।
उसकी छाँव में हुई हैं महफ़िलें ‘शेखर’-
गट्टे वाले बरगद की सदारत ज़रूरी है।

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मैंने जब खोली गुदड़ी की तुरपाई।
❤️माँ मुझे बहुत याद आई।।
उसके एक कोने मे लगा था,
मेरे विद्यालय की गणवेश
का स्वेटर।
उसी से सटा के जुड़ा हुआ था,
मेरे भाई का वो खो-खो
वाला नेकर।
जिसे पहन कर बड़ी भाव
खाती थी-
बहिन की वो फेवरेट वाली फ्रॉक,
क्या गजब की काम आई।
मैंने जब खोली गुदड़ी की तुरपाई।
माँ मुझे बहुत याद आई।
दादी की वो लुगड़ी जिस पर
पत्तीदार गोटा था,
पापा का वो कोट जिसका
कपड़ा बड़ा मोटा था।
वो जिसका हम खेल खेल में
टेन्ट बना लेते थे,
वो चादर भी अलट पलट
कर थी लगाई।
मैंने जब खोली गुदड़ी की तुरपाई।
माँ मुझे बहुत याद आई।
तकियों की खोली,
कमीज,पजामे,बनियान,मफलर।
मोजे,टोपे,टाई,
रुमाल,तौलिया,टी शर्ट भर भर।
सबको सलीके,स्नेह,
समर्पण के रंग बिरंगे
धागों से जोड़ा,
और अपनी सबसे सुन्दर साड़ी,
कवर बनाकर चढ़ाई।
मैंने जब खोली गुदड़ी की तुरपाई।
माँ मुझे बहुत याद आई।
उसने पुरानी ख़ुशियों से नई
ख़ुशी जीने की अनमोल
कला थी सिखाई।
मैंने जब खोली गुदड़ी की तुरपाई।
माँ मुझे बहुत याद आई।

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hole1972 Yeni makale yazdı
3 yıl - çevirmek

Was ist Poker und wie wird es gespielt? | #texas holdem poker

3 yıl - çevirmek

मुश्किलों को आसान रखा है।
बस जीने का सामान रखा है।।
ज़िन्दगी तेरी इन ज़रूरतों ने-
पाँवों का इम्तिहान रखा है।
घड़ियों पर नज़रें रख के भी-
हर लम्हा इत्मिनान रखा है।
गलती नही तुम्हारी इसमें-
जो मुझ पे एहसान रखा है।
हमने दिल के तहखाने से-
सबको ही अनजान रखा है।
वो अभिमानी इसलिए ठहरे-
हद से ज़्यादा मान रखा है।
हमने टूटे ख़्वाबों का ‘शेखर’-
सोच के नाम उड़ान रखा है।

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3 yıl - çevirmek

नये दौर ने बंजारों का इकतारा छीन लिया,
रोज़ी-रोटी ज़िंदगी का गुज़ारा छीन लिया।
क़ुल्फ़ियाँ चुपके से घर को भेजने वालों ने-
रेहड़ियों की घंटियों का हुंकारा छीन लिया।
ये बनाकर के लाओ,तुम वो बन के आओ-
पाठशालाओं ने बचपन सारा छीन लिया।
वो फ़ेरी वाला आख़िर बेचे भी तो क्या बेचे-
पबजी खेल ने उसका ग़ुब्बारा छीन लिया।
पर्दे पर ढाई घंटे की चाँदी सी चमक ने-
गरीब बहरूपियों का सितारा छीन लिया।
कहने लगे हैं आजकल बच्चे पोपकोर्न उसे-
भुट्टे वालों से वक़्त ने अंगारा छीन लिया।
छीन ली एक सभ्यता,एक दौर,एक ख़ुशी-
बाज़ारवाद ने वो दौर दुलारा छीन लिया।

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#thekeralastory देखने बाद पता चला बेटियों को अब्दुल और अफ़रोज़ से ही नहीं
सलमा और शबाना से भी दूर रखना है।😡😡

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