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अमिताभ-धर्मेंद्र अभिनीत फिल्म शोले में धर्मेन्द्र भगवान शिव की आड़ लेकर हेमा मालिनी को प्रेमजाल में फंसाना चाहता है, जो यह साबित करता है कि मंदिर में लोग लडकियां छेड़ने जाते हैं। इसी फिल्म में ए. के. हंगल इतना पक्का नमाजी है कि बेटे की लाश को छोड़कर, यह कहकर नमाज पढने चल देता है कि उसे और बेटे क्यों नहीं दिए कुर्बान होने के लिए।
फ़िल्म दीवार का अमिताभ बच्चन नास्तिक है और वो भगवान् का प्रसाद तक नहीं खाता लेकिन 786 लिखे हुए बिल्ले को हमेशा अपनी जेब में रखता है और वो बिल्ला भी बार बार अमिताभ बच्चन की जान बचाता है। फ़िल्म
जंजीर का अमिताभ भी नास्तिक है लेकिन शेरखान एक सच्चा इंसान है।
फिल्म शान में अमिताभ बच्चन, शशिकपूर के साथ साधू के वेश में जनता को ठगते हैं, लेकिन इसी फिल्म में अब्दुल जैसा सच्चा इंसान है जो सच्चाई के लिए जान दे देता है। अमर-अकबर-एन्थोनी में तीनों बच्चों का बाप किशनलाल एक खूनी स्मगलर है, लेकिन किशन लाल के बच्चों अकबर और एन्थॉनी को पालने वाले मु स्लिम और ईसाई दोनों महान इंसान हैं।
ऐसी जानदार फिल्मों से सनातन की सेवा करने वाले सदी के *महानालायक* अमिताभ बच्चन जी को शुभकामनाएं।