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साहित्य उम्मीद की विधा है क्योंकि यह यथार्थ, क्रूर वर्तमान का सामना करने का साहस करता है | ##information
"हो सकता है मैं जल्द ही अपने शरीर से बाहर हो जाऊँ, उसे एक परिधान की तरह उतार कर। लेकिन मेरा काम नहीं रुकेगा। मैं लोगों को ईश्वर से जोड़ता रहूँगा।" - (स्वामी विवेकानंद)
कलकत्ता के चांपाताला में स्थित सिद्देश्वरी लेन के "मेट्रोपोलिटन स्कूल" की हेडमास्टरी से नरेन्द्रनाथ को यह कह कर निकाल दिया गया था कि उन्हें पढ़ाना नहीं आता ! बी.ए. की परीक्षा पास न कर पाने वाला व्यवस्था द्वारा निष्कासित यही महामानव आगे चल स्वामी विवेकानंद के रूप में "विश्व-शिक्षक" बना ! शिकागो के विश्वप्रसिद्ध भाषण के अतिरिक्त हम में से अनेक भारतीय स्वामी जी की युगदर्शी एवं अग्रिम सोच से आज भी परिचित नहीं हैं ! स्वामी विवेकानंद हमारी हजारों वर्षों की परम्परा का आगामी शताब्दियों के लिए जीवन-संकेत हैं ! सनातन संस्कृति के उच्चतम मूल्यों को सार्थक और स्थापित कर जगत-व्यापी करने वाले विश्व के सबसे प्रांजल, सबसे दिव्य, सबसे तेजस्वी कर्म-गुरु, सर्वमान्य शांतिदूत और धर्म-प्रतिनिधि, स्वामी विवेकानंद जी के महासमाधि दिवस पर उन्हें आकाश भर प्रणाम। उनकी अभूतपूर्व जागृत चेतना से निकले संबोधनों के एक-एक शब्द में युगों को मार्गदर्शित करने की क्षमता है। अतः आवश्यक है हम सब उन्हें पढ़ें, आत्मसात करें और स्वधर्म सीखें ताकि उनके उपरोक्त शब्दों को सच करने में हमारी किंचित् भूमिका भी सुनिश्चित हो सके। 🙏🏻❤️🇮🇳