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संगम पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी के साथ जो हुआ, उसकी आंखो देखी।
मैं उस वक्त संगम पर ही मौजूद था। शंकराचार्य अपने करीब 100 भक्तों-साधुओं-शिष्यों के साथ पुल नंबर दो के जरिए 9 बजे सुबह संगम की तरफ बढ़े। ये पुल बंद था। लेकिन शिष्यों ने बाबा के लिए खुलवा दिया। संगम पर जब पहुंचे तो हर तरफ स्वागत वगैरह हो रहा था।
इसके बाद बाबा की पालकी आगे बढ़ी। वह संगम की तरफ जाना चाहते थे, पुलिस कह रही थी संगम पुलिस चौकी के पास पालकी रोक दीजिए, यहां से पैदल चले जाइए। आगे भीड़ है। दोनों ही जगह में महज 50 मीटर की दूरी रही होगी। यही विवाद की वजह बन गया।
बाबा के समर्थक अड़ गए कि हमें आगे जाने दिया जाए। इसी बीच उनकी बहस शुरू हो गई। बहस धक्का-मुक्की में बदल गई। पुलिस ने एक-एक करके शिष्यों और साधुओं को पकड़ा और उन्हें खींचते हुए संगम पुलिस चौकी तक ले गई। एक शिष्य को तो धक्का देकर गिराया, बाल पकड़कर खींचे और बुरी तरह पीट दिया।
इसके बाद कई और को पकड़ा और ले गए। बाबा अकेले हो गए। बाबा के आसपास पुलिस, आरएएफ और सीएसएफ का घेरा बना दिया गया। 3 घंटे तक बहस चली। बाबा अड़े रहे कि हमारे लोगों को छोड़ा जाए, हमें इज्जत के साथ संगम में स्नान करवाया जाय, इसके बाद ही वापस जाएंगे।
पुलिस नरम हुई, लोगों को छोड़ा गया, पालकी आगे बढ़ी, लेकिन बात वही। पुलिस ने संगम की तरफ जाने नहीं दिया। फिर से धक्का मुक्की। बाबा के सभी लोगों को फिर से खींचकर चौकी के अंदर बंद कर दिया गया।
बाबा की पालकी को कुछ लोग धक्का मारते हुए तेजी से संगम से करीब 500 मीटर दूर तक ले गए। उनका छत्रप टूट गया। किसी शंकराचार्य का यही छत्रप सबसे अहम माना जाता है। जो लोग धक्का दे रहे थे, शंकराचार्य उनसे बार-बार पूछ रहे थे कि तुम लोग कौन हो? किसी ने कुछ नहीं बताया। समर्थक कहते हैं- वो सभी सादी वर्दी में प्रशासन के ही लोग थे।
बाबा को अक्षय वट पर अकेले छोड़ दिया गया। उन्हें बिना नहाए वापस जाना पड़ा। उनके समर्थकों को पुलिस गाड़ी में भरकर उनके आश्रम छोड़ आई।
सही-गलत का फैसला आप करिए। मुझे बस इतना लगता है कि हिन्दू धर्म के इतने बड़े धर्मगुरू के साथ यह नहीं होना चाहिए था। कई और भी बातें थी, जिन्हें नहीं लिखा-दिखाया जा सकता है।
:- राजेश साहू ( पत्रकार)
नोट :- ये शब्द पत्रकार राजेश साहू के है जो खुद को चश्मदीद बता रहे है।फ़ोटो भी उन्हीं के द्वारा लिए गए हैं। 👇

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संगम पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी के साथ जो हुआ, उसकी आंखो देखी।
मैं उस वक्त संगम पर ही मौजूद था। शंकराचार्य अपने करीब 100 भक्तों-साधुओं-शिष्यों के साथ पुल नंबर दो के जरिए 9 बजे सुबह संगम की तरफ बढ़े। ये पुल बंद था। लेकिन शिष्यों ने बाबा के लिए खुलवा दिया। संगम पर जब पहुंचे तो हर तरफ स्वागत वगैरह हो रहा था।
इसके बाद बाबा की पालकी आगे बढ़ी। वह संगम की तरफ जाना चाहते थे, पुलिस कह रही थी संगम पुलिस चौकी के पास पालकी रोक दीजिए, यहां से पैदल चले जाइए। आगे भीड़ है। दोनों ही जगह में महज 50 मीटर की दूरी रही होगी। यही विवाद की वजह बन गया।
बाबा के समर्थक अड़ गए कि हमें आगे जाने दिया जाए। इसी बीच उनकी बहस शुरू हो गई। बहस धक्का-मुक्की में बदल गई। पुलिस ने एक-एक करके शिष्यों और साधुओं को पकड़ा और उन्हें खींचते हुए संगम पुलिस चौकी तक ले गई। एक शिष्य को तो धक्का देकर गिराया, बाल पकड़कर खींचे और बुरी तरह पीट दिया।
इसके बाद कई और को पकड़ा और ले गए। बाबा अकेले हो गए। बाबा के आसपास पुलिस, आरएएफ और सीएसएफ का घेरा बना दिया गया। 3 घंटे तक बहस चली। बाबा अड़े रहे कि हमारे लोगों को छोड़ा जाए, हमें इज्जत के साथ संगम में स्नान करवाया जाय, इसके बाद ही वापस जाएंगे।
पुलिस नरम हुई, लोगों को छोड़ा गया, पालकी आगे बढ़ी, लेकिन बात वही। पुलिस ने संगम की तरफ जाने नहीं दिया। फिर से धक्का मुक्की। बाबा के सभी लोगों को फिर से खींचकर चौकी के अंदर बंद कर दिया गया।
बाबा की पालकी को कुछ लोग धक्का मारते हुए तेजी से संगम से करीब 500 मीटर दूर तक ले गए। उनका छत्रप टूट गया। किसी शंकराचार्य का यही छत्रप सबसे अहम माना जाता है। जो लोग धक्का दे रहे थे, शंकराचार्य उनसे बार-बार पूछ रहे थे कि तुम लोग कौन हो? किसी ने कुछ नहीं बताया। समर्थक कहते हैं- वो सभी सादी वर्दी में प्रशासन के ही लोग थे।
बाबा को अक्षय वट पर अकेले छोड़ दिया गया। उन्हें बिना नहाए वापस जाना पड़ा। उनके समर्थकों को पुलिस गाड़ी में भरकर उनके आश्रम छोड़ आई।
सही-गलत का फैसला आप करिए। मुझे बस इतना लगता है कि हिन्दू धर्म के इतने बड़े धर्मगुरू के साथ यह नहीं होना चाहिए था। कई और भी बातें थी, जिन्हें नहीं लिखा-दिखाया जा सकता है।
:- राजेश साहू ( पत्रकार)
नोट :- ये शब्द पत्रकार राजेश साहू के है जो खुद को चश्मदीद बता रहे है।फ़ोटो भी उन्हीं के द्वारा लिए गए हैं। 👇

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संगम पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी के साथ जो हुआ, उसकी आंखो देखी।
मैं उस वक्त संगम पर ही मौजूद था। शंकराचार्य अपने करीब 100 भक्तों-साधुओं-शिष्यों के साथ पुल नंबर दो के जरिए 9 बजे सुबह संगम की तरफ बढ़े। ये पुल बंद था। लेकिन शिष्यों ने बाबा के लिए खुलवा दिया। संगम पर जब पहुंचे तो हर तरफ स्वागत वगैरह हो रहा था।
इसके बाद बाबा की पालकी आगे बढ़ी। वह संगम की तरफ जाना चाहते थे, पुलिस कह रही थी संगम पुलिस चौकी के पास पालकी रोक दीजिए, यहां से पैदल चले जाइए। आगे भीड़ है। दोनों ही जगह में महज 50 मीटर की दूरी रही होगी। यही विवाद की वजह बन गया।
बाबा के समर्थक अड़ गए कि हमें आगे जाने दिया जाए। इसी बीच उनकी बहस शुरू हो गई। बहस धक्का-मुक्की में बदल गई। पुलिस ने एक-एक करके शिष्यों और साधुओं को पकड़ा और उन्हें खींचते हुए संगम पुलिस चौकी तक ले गई। एक शिष्य को तो धक्का देकर गिराया, बाल पकड़कर खींचे और बुरी तरह पीट दिया।
इसके बाद कई और को पकड़ा और ले गए। बाबा अकेले हो गए। बाबा के आसपास पुलिस, आरएएफ और सीएसएफ का घेरा बना दिया गया। 3 घंटे तक बहस चली। बाबा अड़े रहे कि हमारे लोगों को छोड़ा जाए, हमें इज्जत के साथ संगम में स्नान करवाया जाय, इसके बाद ही वापस जाएंगे।
पुलिस नरम हुई, लोगों को छोड़ा गया, पालकी आगे बढ़ी, लेकिन बात वही। पुलिस ने संगम की तरफ जाने नहीं दिया। फिर से धक्का मुक्की। बाबा के सभी लोगों को फिर से खींचकर चौकी के अंदर बंद कर दिया गया।
बाबा की पालकी को कुछ लोग धक्का मारते हुए तेजी से संगम से करीब 500 मीटर दूर तक ले गए। उनका छत्रप टूट गया। किसी शंकराचार्य का यही छत्रप सबसे अहम माना जाता है। जो लोग धक्का दे रहे थे, शंकराचार्य उनसे बार-बार पूछ रहे थे कि तुम लोग कौन हो? किसी ने कुछ नहीं बताया। समर्थक कहते हैं- वो सभी सादी वर्दी में प्रशासन के ही लोग थे।
बाबा को अक्षय वट पर अकेले छोड़ दिया गया। उन्हें बिना नहाए वापस जाना पड़ा। उनके समर्थकों को पुलिस गाड़ी में भरकर उनके आश्रम छोड़ आई।
सही-गलत का फैसला आप करिए। मुझे बस इतना लगता है कि हिन्दू धर्म के इतने बड़े धर्मगुरू के साथ यह नहीं होना चाहिए था। कई और भी बातें थी, जिन्हें नहीं लिखा-दिखाया जा सकता है।
:- राजेश साहू ( पत्रकार)
नोट :- ये शब्द पत्रकार राजेश साहू के है जो खुद को चश्मदीद बता रहे है।फ़ोटो भी उन्हीं के द्वारा लिए गए हैं। 👇

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मैने सब कुछ तुमको माना....❤️❤️❤️❤️…

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पिछले गुरुवार की बात है, दीपांकर बारदोली नामक एक व्यक्ति ने काम से छुट्टी ली, क्योंकि उसे अपने बेटे के स्कूल जाना था। दीपांकर का बेटा यूकेजी कक्षा का छात्र है। परीक्षा के बाद परिणाम घोषित हुए थे। रिजल्ट लेने के लिए दीपांकर स्कूल पहुंचे थे, लेकिन उन्हें अचानक हार्ट अटैक आ गया।
स्कूल से रिजल्ट लेने के बाद दीपांकर बाहर की तरफ बढ़ रहे थे। तभी 35 वर्षीय दीपांकर को दिल का दौरा पड़ा और उन्होंने मौके पर ही दम तोड़ दिया।

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उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में एक बड़ा हादसा हुआ जब एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की गाड़ी हादसे का शिकार हो गई और नाले में जा गिरी. उसने मदद के लिए कई घंटों तक इंतजार किया, लेकिन समय से मदद न मिलने की वजह से युवराज ने दम तोड़ दिया. युवराज के परिवार वालों ने और अन्य लोगों ने नोएडा विकास प्राधिकरण पर लापरवाही का आरोप लगाया है.

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भारत में बड़े पैमाने पर नकली दाल बिक रही है। इसमें रंग, पॉलिश, सिंथेटिक पदार्थ मिलाए जाते हैं, जो सेहत के साथ खेलवार है। हमेशा जांची-परखी हुई शुद्ध दाल ही इस्तेमाल करें। सबको सावधान करें!

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