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उत्तराखंड में पंचायतों का कार्यकाल अब खत्म होने को है, पर नौसार (बग्वालीपोखर) के ग्राम प्रधान वीरेंद्र जी ने इन पाँच वर्षों में जो किया, वो वाकई काबिल-ए-तारीफ है।
"पहाड़ के गांव की सोच, नई उड़ान!"
बुनियादी विकास तो बहुत प्रधान करते हैं, पर वीरेंद्र भाई ने गांव में पुस्तकालय बनाकर पढ़ने की संस्कृति को पुनर्जीवित किया है।
मोबाइल में उलझी पीढ़ी को किताबों से जोड़ना एक साहसी और सुंदर प्रयास है। यह पुस्तकालय न सिर्फ बच्चों के लिए ज्ञान का केंद्र बनेगा, बल्कि बुजुर्गों के लिए भी एक सुकून भरा ठिकाना होगा।
एक घर में सास और बहू बड़ी ही मोहब्बत से साथ रहती थीं। एक दिन एक मेहमान आया, और सास उससे बात कर रही थीं। बहू पास ही थी और उसने सास को ये कहते सुना—
**"बेटी शक्कर जैसी होती है और बहू नमक जैसी।"**
बस, उस दिन से बहू कुछ बुझ-सी गई। सास ने उसकी उदासी महसूस की और प्यार से पूछा, "बिटिया, क्या बात है?"
बहू ने हिम्मत करके कहा, "आपने मेहमान से जो कहा... वो बात दिल को लग गई।"
सास मुस्कुरा दीं। उन्होंने बहू का हाथ पकड़कर कहा,
**"तू मेरी बात का मतलब शायद ठीक से समझ नहीं पाई। मैंने ये कहा कि बेटी शक्कर जैसी होती है, जो हर हाल में मीठी लगती है। लेकिन बहू... बहू नमक जैसी होती है।"**
**"नमक वो चीज़ है, जो हर खाने का स्वाद बनाती है। जिसके बिना सब कुछ फीका लगता है। और सबसे खास बात— इसका कर्ज़ कभी चुकाया नहीं जा सकता।"**
**"तू मेरे घर की ज़रूरत है, स्वाद है, और सबसे बड़ा सौभाग्य भी।"**
बहू की आंखें भर आईं। आज उसे समझ आया कि उसका होना, उसके अपनाए जाने से कहीं ज़्यादा गहरा है— वो इस घर की ज़रूरी सी चीज़ है, जो सब कुछ पूरा बनाती है।
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