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आँखों की रौशनी जाने के बाद भी ओझल न हुआ लक्ष्य
अक्सर जब जिंदगी में चुनौतियां आती हैं, तो लोग हार मान लेते हैं, लेकिन कुछ लोग होते हैं जो इन चुनौतियों को अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने का माध्यम बना लेते हैं। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी है भारत के पहले नेत्रहीन पैरालिंपियन अंकुर धामा की, जिन्होंने अपने अडिग हौसले से न केवल खुद को, बल्कि पूरे देश को गर्व महसूस कराया। 🎖️
अंकुर धामा, जो केवल छह साल की उम्र में होली के रंगों के संक्रमण के कारण अपनी आंखों की रोशनी खो बैठे थे, ने कभी भी अपने लक्ष्य से नज़र नहीं हटाई। यह हादसा उनके लिए जीवन का एक बड़ा मोड़ था, लेकिन उन्होंने इसे अपने सपनों को साकार करने की प्रेरणा बना लिया। अपनी दृष्टि खोने के बाद, अंकुर दिल्ली चले आए और जेपीएम सीनियर सेकेंडरी स्कूल फॉर द ब्लाइंड में अपनी शिक्षा प्राप्त की। वहां से, उनका सफर सेंट स्टीफंस कॉलेज में इतिहास की पढ़ाई तक पहुंचा, लेकिन उनकी दिलचस्पी हमेशा खेलों में रही। 🏃♂️
अंकुर ने अपने खेल करियर की शुरुआत 2014 के एशियाई पैरा खेलों से की, जहां उन्होंने एक रजत और दो कांस्य पदक जीते। उनकी प्रतिभा और दृढ़ संकल्प ने उन्हें भारतीय पैरा-एथलीट्स की श्रेणी में शीर्ष पर पहुंचा दिया। हालांकि, 2016 के पैरालिंपिक में उन्हें चोट लग गई थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपने सपनों की ओर बढ़ते रहे। 💪
राजस्थान के डीग जिले में चल रहे कुश्ती दंगल में, शेर Hariram Chaudhary (हरिश्चंद्र पहलवान गिरसै) , जिला केसरी बनने पर ऐतिहासिक जीत की बहुत बहुत बधाई एवम उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं💐💐
आपको बता दें कि डीग राजस्थान का नवीनतम जिला है जिस कारण हरिराम चौधरी डीग के पहले जिला केसरी बन चुके हैं।
आज डीग को कुश्ती का एक नया सितारा मिल गया 🌄
#जिला_डीग
स्वरोजगार की तरफ एक कदम साथियों कभी भी आप लोग देहरादून F R I घूमने आओगे तो नेगी जी भोजनालय पर एक बार जरूर आएं और नेगी जी के हाथो का स्वाद अवश्य लें धन्यवाद 🙏🙏
#फिर_होली_भेंट
सुमित अंतिल भारतीय पैरा-एथलीट और जेवलिन थ्रो में विश्व रिकॉर्ड धारक हैं। उनका जन्म 6 जुलाई 1998 को हरियाणा के सोनीपत जिले में हुआ था। सुमित का जीवन तब बदल गया जब 2015 में एक सड़क दुर्घटना में उनका एक पैर खो गया। इस हादसे के बावजूद, सुमित ने अपने सपनों को टूटने नहीं दिया और पैरालंपिक खेलों में हिस्सा लेने का फैसला किया।
उन्होंने 2021 के टोक्यो पैरालंपिक में पुरुषों की जेवलिन थ्रो F64 श्रेणी में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा। सुमित ने इस प्रतियोगिता में 68.55 मीटर की दूरी पर भाला फेंककर नया विश्व रिकॉर्ड बनाया। इस प्रदर्शन ने उन्हें दुनिया भर में प्रसिद्ध कर दिया और उन्हें भारत के लिए एक गौरवशाली एथलीट बना दिया। सुमित की सफलता का श्रेय उनकी कड़ी मेहनत, दृढ़ संकल्प और उनके कोचों के समर्थन को जाता है। उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और कई पदक जीते। सुमित की कहानी उन सभी के लिए प्रेरणा है, जो जीवन में किसी भी प्रकार की चुनौती का सामना कर रहे हैं। उनकी यात्रा यह साबित करती है कि यदि किसी में साहस और समर्पण हो, तो कोई भी बाधा उनके सपनों को पूरा करने से रोक नहीं सकती। सुमित अंतिल का जीवन एक मिसाल है कि किस तरह से एक कठिनाई को जीत में बदला जा सकता है, और उन्होंने यह साबित कर दिया है कि असली चैंपियन वही होते हैं, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहते हैं।